Saturday, December 25, 2010
एक रिश्ते की खोज...
हम लोगों को समझना नहीं चाहते। या कहें कि लोग हमें नहीं। दोनों एक ही बात है। रिश्ते बनाना दुरूह काम है। क्योंकि एक बार ये बन गए, तो इससे जुड़ी तमाम बातें इसे बरकरार रखने के लिए जरूरी हो जाती हैं। कुछ भी समझने की सबसे दिक्कत है कि इससे ही आगे निभाने या टालने का पहला प्रश्न खड़ा हो जाता है। सो हम समझदारी में टालने को वक्त के साथ ज्यादा महत्व देते जाते हैं। वैसे हम सहज संबंधों में ज्यादा आसानी पाते हैं। सो दोस्ती ही एकमात्र रिश्ता हैं, जहां दो व्यक्तित्व एक जगह-विचार-विस्तार में बिना किसी हस्तक्षेप के साथ रह सकते हैं। तो क्या सबको दोस्त बना लें। नहीं। पर हां सबसे दोस्ताना तो हुआ जा सकता है। मसलन, बीवी से उसकी सोच के अनुरूप ही व्यवहार करना व्यवहारिकता और आपकी ‘दोस्ताना समझदारी’ की मिसाल बन सकता है। और सहकर्मी के साथ बातें खुलकर कहने में मददगार।
जाहिर है वक्त के साथ संबंधों में जो ऊर्जा घटती है, उसे केवल आपका खुलापन ही दूर कर सकता है। स्वीकारना ही सबसे बड़ी सच्चाई है। और इससे ही नई राहें खुलती है। हम ज्यादातर अपनी सामाजिक स्वीकार्यता और पहचान को मानक बनाकर भविष्य के प्रति नींद में रहते हैं। लगता है सपनें नींद में ही अच्छे। हमारी पहचान के भी स्तरों पर हम गौर करना होगा। कुछ लोग बहुत अच्छी बात करते हैं, पर उनका जीवन सबके लिए उदाहरण नहीं होता। कुछ लोग काम में बेहतरीन होते हैं, पर वे सबके प्रिय नहीं होते। ऐसे तमाम विरोधाभास आपको अपने पास मिलते रहते हैं। पर इसके लिए कारण खुद को ‘कुछ और बनाकर’ पेश करने से पैदा होती है। जबकि आपकी सच्चाई उस स्वीकार्य सच से अलग होती है, जो परिस्थितिवश निर्मित है। असली व्यवहार वो है जिसे आप बिना किसी सोच के करते हैं।
हमारे जीवन में कई बार अच्छा या बुरा लगने का फैसला या उसे जाहिर करने का फैसला हम अगल-बगल देखकर करते हैं और एक समय के बाद ये हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। कई बार जब हम, हम होते हैं, तो इस बनावटी या ‘खुद को खो देने’ वाला व्यवहार हमें हमारा नहीं लगता। पर इसे तोड़ना हमें नहीं आता। दरअसल ये फैसला हमारे खुद के सही और गलत से जुड़ा होता है। हम ‘अपनी बनाई दुनिया’ को ही सबकी दुनिया मानते हैं। सामाजिक ताने-बाने के इस आवरण में खुद को सबसे अलग बनाए रखने के लिए हम सबके जैसे हो जाते हैं और पारस्परिक व्यवहार या प्रशंसा को खुद की पहचान का मानक मानना हमारी मजबूरी बन जाता है।
अपने काम के अनुभव और वास्तविक जीवन के अनुभव को आप एक पलड़े में रखकर देखने का आदी नहीं होते हैं। आपको हमेशा ये समझाया गया है कि पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ अलग-अलग रखनी चाहिए। सो आप मानते है कि आप अर्द्धनारीश्वर जैसी कोई रचना है, और कहीं कुछ और कहीं कुछ और बने रहने में ही आप सफलता के करीब हैं। खैर बदलने के लिए, या सही को सही महसूस करने के लिए निरपेक्ष होना पड़ता है।
लोगों का जाना आपको इसलिए अखरता है कि क्योंकि वे या तो आपके जीवन में आपको आपका महत्व समझाने वाले होते हैं, काम में आपके लिए दोस्त, मानक स्थापित करने वाले, या बिना लाग-लपेट खुद बने रहने वाले होते है। जीवन के और रिश्तों में निभाना और बनाए रखना कई बार सामाजिक नैतिकता-अनैतिकता के दायरे में ज्यादा आता है। पर काम और दोस्ती में ये आपके खुद की दुनिया में दूसरे की बिना छेड़छाड़ किए मौजूद रहने की कला जैसा होता है।
हम आगे ही जा सकते है, पीछे नहीं। पीछे के रिश्ते, दोस्ती, संबंध दोबारा साथ आने पर भी अहसास का वो गुलदस्ता नहीं खिला सकते, जो बीते मौसम में घटा था। इसलिए किसी भी रिश्ते को वक्ती अहसास मानकर खारिज करना, खुद से दगा करने जैसा है। आप जो भी महसूस करते है, वो आपके बिताए पूरे जीवन का निचोड़ होता है। मिलना-मिलाना, निभना-निभाना, करना-करवाना जैसे शब्दों के मायने केवल आपकी सोच से बदलते हैं। सो इस बार जब कोई जाता दिखे, तो उसे रोककर खुद बनकर’ थोड़ा अपने साथ जोड़ लीजिएगा। ये ही संसार का सबसे बड़ा रिश्ता होगा।
भव्य
Tuesday, November 2, 2010
Monday, November 1, 2010
सफर का तीसरा पड़ाव : कामदेव-रति की देवी

यहां बसी मां की छवि पत्थर की जिस शिला पर उकेरी गई है, वो कम रोशनी में साफ नहीं दिखती। मंदिर का गर्भगृह छोटा है, आस्था के इस धाम में कुछ समय पहले चोरों ने असली मूर्ति को ही गायब कर दिया और फिर बाद में एक नई मूर्ति स्थापित की गई। मां छिन्नमस्तिका का रूप थोड़ा भयावह है, उन्होने अपना ही सिर काटकर अपने हाथ में ले रखा है, और उनके धड़ से निकली खून की धारा निकलती है। खास बात ये कि माता के पैरों के नीचे कामदेव और रति मौजूद हैं। इसका अभिप्राय है कि दुनिया की शुरूआत जिस प्रेम ओर संसर्ग से हुई है, उसकी अधिष्ठात्री देवी है मां छिन्नमस्तिका।
रजरप्पा में बना मां छिन्नमस्तिका का मंदिर छोटा ही है, लेकिन यहां भक्तों का तांता लगा रहता है। हम नवरात्रि में यहां पहुंचे थे, चारों ओर इस देवीस्थान में भक्ति का एक अलग अहसास था। मंदिर देखने पर आपको कामाख्या के मंदिर की याद आती है, बस अंतर रंग और रोगन का है। नीले, लाल और सफेद रंगों से मंदिर को लुभावना बना दिया गया है। मंदिर निर्माण की सबसे खास बात ये है कि ये छिन्नमस्तिका यंत्र के हिसाब से ही बना है। इसका मतलब है इसके आठ मुख और चौसठ योगनियों का वास है।
मंदिर के अंदर कई खास स्थान हैं, नवरात्रि भर यहां बलि का सिलसिला कुछ ज्यादा ही बढ़ जाता है। फरसे के एक वार में बकरे की जान जाते देखना पीड़ादायक होता है। पर एक लोकमान्यता भी यहां इसे जायज ठहराती है। जिस स्थान पर बलि दी जाती है, वहां खूनमखून होने पर भी मक्खियां नहीं भिनभिनाती। इसे लोग देवी का चमत्कार मानते हैं। बलि स्थान के सामने नारियल बलि भी दी जाती है।
रजरप्पा जाने के लिए आपको रांची या बोकारो जाना पड़ता है। दोनों ही शहरों से इसकी दूरी समान ही है। रजरप्पा से जुड़ी मान्यताओं में जन्मकुंडली का राहुदोष दूर होना सबसे मान्य है। कहते है यहां के दर्शन से ही आपका राहु दोष गायब। इसके अलावा यहां शादी विवाह के मौसम में बड़ी भीड़ होती है। एक मॉर्डन मान्यता भी है...नई गाड़ी की यहां पूजा कराने से गाड़ी की उम्र और परफार्मेंस बढ़ जाती है। मारुति वाले सुनो।
रजरप्पा की इस यात्रा में थोड़े में बहुत कुछ मिला... आगे करेंगे वाराणसी की विशालाक्षी देवी के दर्शन। सामान उठाओं....गाड़ी से ही बनारस जाना है।
भव्य
Sunday, October 24, 2010
सफर का दूसरा पड़ाव...कोलाहल में शांत काली
मंदिर के पास ही गंगा नदी बहती हैं, यहां कभी किसी तपस्वी ने मां की घोर आराधना की थी। गंगा वैसे को कहीं साफ नहीं रह गई है, यहां आप इसे देखेंगे तो मन दुखी ही होगा। गंगा से एक ओर से दूसरी ओर जाने के लिए केवल 50 पैसे लगते हैं। आज भी।
रानी ने जब दक्षिणेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया तो उन्होने यहां मां काली की एक मूर्ति लगवाई, जो बाद में उन्हे पसंद नहीं आई। तब मंदिर के पुजारी के सुझाव पर यहां मां काली की एक नई मूर्ति लगवाई गई, जो आजतक स्थापित है, ये पुजारी रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई थे।
भव्य ‘नामा’
Saturday, October 23, 2010
Friday, October 22, 2010
ये सिर्फ सफर नहीं है...

दुर्गा दर्शन - कामाख्या शक्तिपीठ, गुवाहाटी, असम
लिखने के लिए लिखा जाए, तो वो रचना नहीं होती। उसी तरह जब घूमने के लिए यात्रा नहीं की जाती, तो वो सफर नहीं होता। लीजिए। हम तो तैयार भी नहीं थे, तारीख थी 4 अक्टूबर 2010, दिन भर के लिए शूटिंग प्लान तय था। शो भी तय था। एंकर तय थीं, दिल्ली में संवाददाताओं के जरिए दर्शकों को शक्तिपीठ के दर्शन कराने थे। मानो मां दुर्गा को ये मंजूर न था। पूरा दिन हम शूट करते रहे। शाम हो रही थी। अचानक फोन आया, और इसके बाद जो हुआ, वो अचानक, आकस्मिक और उल्लसित करने वाला था। हमें आदेश हुआ था कि हम नौ शहरों में मौजूद शक्तिपीठों पर जाकर शूट करना था।
चलिए। दिल्ली से सुबह 8.50 की फ्लाइट। पहला पड़ाव था गुवाहाटी, कामाख्या शक्तिपीठ।
इस शक्तिपीठ के बारे में काफी कुछ सुना था। तंत्र साधना का महापीठ माना जाता है इसे। हम यहां शाम को 6 बजे के करीब पहुंचे। रोशनी में नहाया वो पौराणिक मंदिर एक नजर में तो केवल स्थापत्य के हिसाब से मंदिर ने पहली नजर में काफी प्रभावित किया। मंदिर के हर खंभे पर देवियों के प्रतिमाएं काफी मोहक थी। और सबसे खास था कि मुख्य मंदिर के इस ढांचे में हर कहीं सफेद कबूतरों का जमावड़ा लगा रहता है। इसे देखना काफी अच्छा लगता है। नीलांचल पहाड़ियों पर मौजूद इस मंदिर में तीन देवियां स्थापित हैं। मां सती की योनि यहां गिरने की मान्यता है। इसके अलावा दो और देवियों की शिला भी मुख्य मंदिर के गर्भगृह में मौजूद है। गर्भगृह में दर्शन में तो निराशा ज्यादा होती है, यहां दर्शन की एक कतार सुबह 5 बजे से लगी रही, 501 रूपए देने पर पंडा समाज के लोग यहां खास दर्शन करा देते हैं। ये अच्छा नहीं लगा। खैर हम भी सिफारिशी आधार पर विशेश दर्शन के अधिकारी बनें। घुप्प अंधेरे में रेंगते, कई देहों से सटते हम गर्भगृह में मां कामाख्या की उस शिला पर रखे कई किलो फूलों को छूकर हमने मां को महसूस करने की कोशिश की। इस शक्तिपीठ में कोई मूर्ति या मुखौटा नहीं है। यहां एक शिला है, जिसे अगल बगल से पानी बहता है, पानी को लेकर कई मान्यताएं है, लेकिन भौगोलिक आधार पर ये ब्रह्मपुत्र नदी का ही हो सकता है। साल में जून के महीने में मान्यता है कि मंदिर का ये जल सादा जल लाल हो जाता है, और इसे मां सती के रजस्वला होने का पर्व माना जाता है। इन पांच दिनों में मंदिर में कई सौ मीटर धोती रखकर द्वार बंद कर दिए जाते हैं। और पांच दिन बाद ये पावन कपड़ा यहां के पंडा समाज में बांट दिया जाता है, जो इसे भक्तों को निशुल्क या सशुल्क देता है। मुझे भी दो टुकड़े मिले, काफी मशक्कत के बाद (लेकिन मां की मर्जी कुछ र थी....ये किस्सा इलाहाबाद से जुड़ा, आगे बताउंगा)।
कामाख्या धाम की पहली शाम काफी काफी मोहक थी, तंत्र और धारणाओं के अहसास से दूर। हम उस शाम की रोशनी में जितना काम कर सकते थे, किया। फिर आरती के क्षणों और नगाड़ों के स्वर के बीच मदहोश होने के पलों के साक्षी बनें। ये किसी भी मंदिर या धाम का वो संगीत है, जो मन से जुड़ता है।
भोर की पहली किरण के साथ हम कामाख्या में थे। वक्त कम था, पर जितनी तेजी से हम काम कर रहे थे, दिन उतनी ही थीमी गति से बढ़ रहा था। बलि की प्रथा, देखी है, कामाख्या में भैंस और बकरी की बलि किसी भी एनिमल एक्टिविस्ट को हिला कर रख दे। पर प्रथा है भइया। जारी है।
गुवाहाटी शहर की सड़कें निराश करती है, जाम बहुत लगता है। इस शहर में महसूस करने को और भी कई जगहें होंगी, हम ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पर एक नाव पर भी जाने का मौका लगा। इतनी चौड़ी नदी नहीं देखी थी, नदी के सीने पर बीचों बीच नीलांचल पर्वत अच्छा लगता है।
इस सफर का अगला पड़ाव कोलकाता है, जहां हमें मिलना था 'रामकृष्ण परमहंस' से....
Tuesday, August 17, 2010
पीपली लाइव की पत्रकारिता का पीपल
जनता क्या देखना चाहती है, ये समय और काल तय करते हैं। फिल्म और टीवी में तो देखना-दिखाना, पसंद-नापसंदगी के मानक दर्शक-बाजार की रूचि पर तय होता हैं। लेकिन पत्रकारिता के द्वंद में फंसे पत्रकारों को अपनी तस्वीर देखना भाता ही है। किसी भी टीवी पत्रकार को 'सच को सच' मानने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती। यकीन मानिए, जो दिखता है, उसमें सबकुछ झूठ नहीं होता।
अब पीपली... की बात करते हैं। एक गांव के किसान को जमीन नीलाम होने से बचाने के लिए एक लाख की जरूरत है, फिल्म में सबको पता है। लेकिन कायदे-कानून-सीमा-राजनीति और फायदे-नुकसान के लिए हर कोई बेबसी झलकाता है। मीडिया का एक स्थानीय संवाददाता खबर न मिलने की सूरत में एक दिन नथ्था की आत्महत्या की बात को खबर बना देता है। बात मानवीय थी, सच्चाई के करीब। सो खबर को नजरों में बसाने के लिए कई बड़े पत्रकार चल पड़े गांव की ओर। बीच में एक शब्द बसा है - टीआरपी। वो खबर जिसमें सबकी रूचि हो। पब्लिक इंटरेस्ट का एक अर्थ होता है - जनहित और दूसरा जनरुचि। आज का टीवी जनरूचि पर ज्यादा काम करता है। ये हम भी मानते हैं।
तो फिल्म में सारे सवाल उठते हैं, मजाकिया लहजों में। गालियां भी बोली जाती हैं, पर जनता के इस दर्द को कई नहीं समझता। जनता भी हॉल में हंसती ही है। फिल्म को बनाया भी कुछ इसी टोन में है। फिल्म जब खत्म होती है, तो एक पत्रकार की मौत हो जाती है। वो नथ्था के बनाएं दाक्षागृह में शहीद हो जाता है। एक पत्रकार का काम पूरा होता है। पर फिल्म में वो कई बार जलील होता है। खुद की खबर पर शहर के पत्रकारों के रवैये को देखकर गांव का पत्रकार रोता है। पर वो सही बात कहता है।
पत्रकार होना आसान है। बनें रहना मुश्किल। सच आसान है, कहना मुश्किल। फिल्म सच कहती है। अतिरेक भी करती है। फिल्म है भई। पर इसी के आधार पर टीवी पत्रकारों के जज्बे को खारिज करना जायज नहीं लगता है। बनने दीजिए दो चार फिल्में, आने दीजिए उन्हे शोध करने के लिए कि, टीवी के पत्रकार का एक अदद दिन होता क्या है। मेरी जानकारी में अभी तक बनी टीवी पत्रकारिता पर फिल्मों में टीवी पर दिख रही प्रस्तुति को समझकर ही उसे दिखाया जाता है। लेकिन किसी असली पत्रकार के जीवन को समझने के लिए उसके साथ रहना होता है, उसके माहौल को समझना होता है।
मैं किसी भी बेतुकी खबर को टीवी पर पेश करने वाले कौम से कतई सरोकार नहीं रखता है। पर इस कौम पर तोहमत लगाने से पहले इसकी खबरों में सच्चाई की ताकत से आम आदमी को साहस देने की बात को दिमाग में रखिएगा। हर नवोदित को समझदार बनने में समय लगता है। मार्शल मैकलुहान ने कहा था कि - मीडियम इज द मैसेज - माध्यम ही संदेश है। टीवी का विकास एक जनसूचना देने वाले माध्यम के तौर पर हुआ था, बाद में इसमें मनोरंजन शामिल हुआ। सूचना ने समाचार का रूप लिया। अब सूचना, समाचार औऱ मनोरंजन की खिचड़ी परोसी जा रही है। लेकिन ये दौर भी बदलेगा। और एक दिन यहीं सूचना आपको अधिकार देने वाली कोशिश होगी।

