Monday, May 21, 2007

हाजमोला की चाय, गोरखपुर से - 2

चाय मेरे हाथ में थी। नमकीन काली चाय। मन में कई तरह के स्वाद पनप रहे थे। कैसी होगी ये सड़कछाप चाय। वैसे भारत में जो सबसे शानदार चाय बनती और पी जाती है, वो सड़क के किनारे ही बनती और पकती है। तो मैने चाय वाले युवक को बिना पैसे दिए एक नया स्वाद चखने का मन बना लिया। और यकीन जानिए इस नए इरादे के लिए न तो मन तैयार था न तो जबान। खैर युवक इस बीच में अपनी बातें बताता रहा कि कैसे इस चाय से दिन की शुरूआत करने से हाजमा और गैस की दिक्कत नहीं रहती। और तो और आपका दिन भर पेट हल्का बना रहता है। अपने ग्राहकों का हवाला भी उसने दिया। वैसे जिस भी ग्राहक के बारे में वो बता रहा था, वो न तो ब्राण्ड थे और न ही अमीर। हमारे मुहल्ले में सड़क किनारे सब्जी का एक बड़ा बाजार लगता है। और उसके ग्राहक वही सब्जी वाले थे। बातों बातों में चाय वाला अपनी इस इजाद की कहानी भी बता गया कि किस तरह उसने नया सोचा और उसे बेचने में सफल रहा। हालांकि इसके पेटेण्ट के बारे में उसने सोचा भी न होगा। मैने प्लास्टिक के कप को मुंह से लगाया। मध्यम गर्म चाय का पहला स्वाद मेरे होठों से टकराया। और जबान में तीखापन छा गया। लगा जैसे आमपना को गर्म करके पिलाया जा रहा हो। लेकिन ये अनोखा था। दूसरा, तीसरा और चौथे सिप तक ये स्वाद भाता जा रहा था। कुल आठ घूंटों में चाय खत्म थी। और मैं हतप्रभ भाव से चाय वाले को देख रहा था। शिव खेड़ा की मशहूर किताब-यू कैन विन- में एक उदाहरण है। एक ठण्डी चाय बनाने और उसे प्रचलित करने की जद्दोजदह का। आज हर कैफै में कोल्ड टी बिकती है। मैं सोच रहा था कि अगर इस चटपटी चाय को उद्योग में परिवर्तित किया जाए तो बुरा न होगा। पर सवाल यही था। चाय वाले ने मुझे बताया कि पहले पहल उसने ये चाय खुद पी, परिवार को पिलाई और फिर ग्राहकों को, इस विश्वास के साथ कि, ये दवा है, पेट की चटपटी दवा। और धंधा चल निकला। अब उसे कम्पटीशन झेलना पड़ा रहा है। हमारे मुहल्ले में अब तकरीबन चार से पांच चाय वाले है। वैसे वो चाय बनाने की सामग्री नहीं बताता और चाय को हाजमोला की चाय बताकर बेचता है। लेकिन ये सच नहीं लगता। स्वाद से एकबारगी लगता है कि ये काली चाय में हाजमोला डालकर बनाई गई चाय होगी। लेकिन कुछ ऐसा मसाला भी है, जो वो नहीं बताता। ये कोक और पेप्सी जैसा राज है। उघोगधर्मिता का स्पष्ट उदाहरण वो चाय वाला अभी मेरे मुहल्ले तक सीमित है। लेकिन उसका स्वाद आज मेरी जुबान पर है। और पता नहीं कल ये हाजमोला की नई खोज न बन जाए। वैसे मैं जानता हूं कि स्वाद को बता पाना शब्दों में मुश्किल है। लेकिन यकीन जानिए चटपटी चाय का स्वाद अनोखा और अलग जरूर था।

3 comments:

परमजीत बाली said...

काश! हमारे मोहल्ले मे भी कोई ऎसा चाय वाला होता। तो जिस चाय की आप इतनी तारीफ कर रहे हैं हम भी पी पाते।

Raviratlami said...

"...भारत में जो सबसे शानदार चाय बनती और पी जाती है, वो सड़क के किनारे ही बनती और पकती है।..."

बिलकुल सही कहा जी! और सड़क के किनारे खड़े होकर गपियाते हुए चाय सुड़कने का भी मजा शानदार होता है जो किसी कैफ़े के कोने के टेबुल पर नहीं मिलता.

संतोष said...

हाजमोला की चाय पिलाने के लिए धन्यवाद।

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