ये छपा था....http://mohalla.blogspot.com/2007/04/blog-post_10.html
लोग चुप रहे।
बहसें तमाम हुईं।
हम एक मजहब के हुए।
जिंदगी आम हुई।
मुसलमां होना क्या होता है? ये जानना-समझना केवल फैसलों की छांव में मुश्किल है। दरअसल इस देश की साझा विरासत को जीने के लिए ही गंगा जमुनी तहजीब को रचा गया। आज के समाज में जब विचार पैदा करने वाले ज्यादातर माध्यम अपनी भूमिका से परे हैं, एक बुनियादी सवाल पर सबका चीखना समझदारी लगता है। देश में बीस करोड़ के लगभग के हमारे भाईयों को एक फैसले की दरकार थी, या जरूरत थी, ये कहना मुश्किल है। पर ये जानना जरूरी है कि ये फैसला अभी क्यों आया है। एक ऐसा चुनाव देश के सामने है, गुजर रहा है, जो देश की बदलती तस्वीर से बिल्कुल अलग गति से लड़ा और जीता जाता है। उत्तर प्रदेश पर अभी तक कोर्ट का कोई ऐसा फैसला नहीं आया है, जो यहां के पत्थरनुमा जातिगत ढांचे की तह में जाने का रास्ता दिखाये। सो मौका था कि हम ये जानें कि दरअसल इस प्रदेश में साढ़े तीन करोड़ के करीब मुसलमान हैं, और ये कुछ इलाको में बहुसंख्यक है, तो कुछ में अल्प प्रभावी। अल्पसंख्यक कहना इसलिए उचित नहीं है, क्योंकि जीने के लिए जो बुनियादी जरूरतें चाहिए वो इनके पास नहीं हैं, तो ये एक समुदाय है। एक वजूद को तलाशता समाज। कई बार ठगा जा चुका समाज। और इसके आंतरिक ताने बाने इतने पेचीदा हैं कि आप बाहर से इसे केवल एक झुंड मान सकते है। और इस झुंड का व्यवहार भी एक ही मानते आये हैं। कुंठा और हताशा केवल एक स्थिति को बता सकती है, लेकिन हर दिन खोते जाने का डर ज्यादा भयानक होता है। कहा जा रहा है कि जज साहब के ताल्लुकातों से फैसले के पेंच हैं। ये बात कितनी वज़नदार है, पता नहीं। लेकिन एक बड़ी पार्टी के एजेंडे के तौर पर मुस्लिम विरोध की सीडी का बंटवाया जाना और इसमें कही गयी बातों को फैसले के मर्म से जोड़ कर देखने पर कुछ कुछ साफ होता है। जैसे मुस्लिम आबादी बढ़ा रहे है... और फैसला उन्हे बहुसंख्यक कहता है। ये महज संयोग भी हो सकता है। दूसरी पार्टी की आला महिला नेता इसे साज़िश बताती है। सही वक्त पर सही साज़िश। वे कहती है, मुसलमानों का पक्ष कमजोर तरीके से रखा गया। सत्तासीन सरकार ने ऐसा जान-बूझ कर किया। सत्तासीन सरकार के राज में हल्के दंगे और मदरसों में हादसे हो चुके हैं। सो वो चुप रहना बेहतर समझती हैं। राहत खुद अदालत से आ गयी। फैसला को बड़ी बेंच ने खुद ही रोक दिया गया। और एक विराम सा लग गया। ये विराम इस समुदाय पर कई बरसों से लगा है। विकास का विराम, पहचान का विराम और खुद को न बता पाने का विराम। कहा जाता है कि इस देश में हर चीज के पीछे राजनीति होती है। तो चश्मा उतार कर भी देखा जाए, तो कहीं न कहीं चुनाव और उन्हें भुनाने या किनारा लगाने की एक और मुहिम जारी है। गंगा में बहता पानी और जमुना के साथ संस्कृति में काफी कुछ बदल चुका है। नहीं बदली है, तो सोच और उसे पुष्ट करती राजनीति।
Wednesday, May 2, 2007
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