Thursday, May 10, 2007

सदी का सामान्य महानायक

सदी के महानायक ने जब कहा कि जुर्म यहां कम है, तो ये बात बहुतों को नागवार गुजरी। सदी के कालपुरुष ने जब मंदिर मंदिर जाकर अपने सुपुत्र और वधु के लिए दुआएं मांगी, तो ये बात उनके कद की नहीं लगी। और सदी के सबसे बड़े कार्यरत कलाकार ने मीडिया को जिस तरह से शादी से दूर रखा, तो ये बात किसी को नहीं भाई। बीते हफ्ते दो ऐसे लेख देखने को मिले , जो अमिताभ बच्चन को एक सामान्य व्यक्ति साबित करने के लिए काफी है। एक व्यक्तिगत सामान्य भारतीय। भारतीय होना गर्व की बात है। लेकिन आप अगर कद्दावर हो, तो आपकी उठक बैठक पर सबकी नजर होती है। सो आप जो चरते है, वो सबके लिए खाद्य पदार्थ हो जाता है। अमिताभ ने जो ऊंचाईयां पाई है, उनमें जो भी किस्से जुड़े है, वे मीडिया की बदौतल ही परवान चढ़े है। चाहे वो उनका नामकरण हो या आकाशवाणी में उनका न चुना जाना। कलकत्ता से मुंबई आना या बरसों संघर्ष करना। आज वे युगपुरूष है, जिसके चारों और आज के युग निर्माता खड़े है। अनिल अंबानी से अमर सिंह तक। अमिताभ ने एक पेपर को कहा कि उनके बेटे की शादी कोई अवार्ड पार्टी नहीं थी। ठीक। लेकिन केवल उन्हे बुलाना जो आपको किसी न किसी मुकाम पर फिल्मी दुनिया में अवार्ड दिला सके, कहां तक सामान्यता है। यश चोपड़ा, करण जौहर और रामगोपाल वर्मा। ये वो फिल्मी चितेरे है, जो आज के फिल्म को बना और आगे बढ़ा रहे है। ये सही मायने में शहंशाह की च्वाइस है। बेटे के करियर का सवाल है क्या करें। अभिषेक को फिल्मी पर्दे पर टक्कर देन वाला कोई अभिनेता उनकी शादी में मौजूद नहीं था। शाहरूख, रितिक, सलमान, आमिर सब नहीं थे। मानते है कि शादी में आपके खास तो होगें ही। पर खास भी फ्यूचर प्लानिंग के लिहाज से चुने हुए। अब बात करीबियत की। कौन कितना करीब है। अमर सिंह कार्ड पर थे, वे बचपन के दोस्त नहीं थे, राजीव गांधी की तरह। पर आज गांधी के हाथ की जगह सपा का साथ अमिताभ के लिए ज्यादा दोस्ताना है। ये बात मैं नहीं मीडिया पर हर दिन आपने देखी है। इलाहाबाद से कोई वास्ता न बचा हो, पर मुलायम सिंह की जनसभा में जया बच्चन शहर की बहू होने का वास्ता देकर वोट मांगती है। शादी में इलाहाबाद में किसी को नहीं बुलाया गया। पर अमिताभ की राजनीति की जंग का पहला मैदान इलाहाबाद था, और सब कुछ सामान्य रहा तो आगे भी होगा। अनिल अंबानी उनके दोस्त है और वे जानते है कि उनके साथ बार बार तिरूपति जाने से वे भागवान के ज्यादा कृपापात्र बने रहेंगे। लोगों की नजर में उनकी अहमियत आज भी कद या पद से नहीं है। वे सार्वकालिक प्रतिभावान कलाकार है। पर वहीं वे एक सामान्यता भी साथ ले कर चलते है। इससे वे लोगों के करीब थे। लेकिन जीवन के दूसरे पारिवारिक फैसले में फ्लाप साबित हुए है। अंधविश्वास, अतिदान, निजता, और दिखावे ने उन्हे भारतीय तो बना दिया है, पर एक फीके डायलाग के साथ। उम्मीद है आने वाले दिनों में हम किसी और तमाशे की ख्वाहिश इस महाकलाकार से नहीं करेंगे।

1 comments:

परमजीत बाली said...

भव्या जी,करनी और कथनी मे यह फर्क आप को सब बडे़ लोगो मे ज्यादातर दिख जाएगा।अच्छा लेख है।

Web Ring

Powered by WebRing.