Friday, May 18, 2007
हाजमोला की चाय, गोरखपुर से
चाय गरम चाय। नमकीन चाय। पेट को दुरूस्त रखे चाय। हाजमोला की चाय। चौदह मई की शाम। अपने शहर गोरखपुर में शाम को सब्जी मंडी में हरियाली देख रहा था। कान में ये आवाजें पड़ी। चौंका। देखा एक मध्यम साइज की केटली में एक बीस बाइस साल का लड़का ये पुकार लगा रहा था। चलिए ये बात तो आम है। लेकिन जो शब्द वो कह रहा था, उसका चाय से नाता जोड़ना मुश्किन लगा। पेट को दुरूस्त रखे चाय। कहां बचपन से चाय पीने से गैस, कब्ज और एसिडिटी की शिकायत का राग, कहां पेट को दुरूस्त रखने वाली नमकीन चाय। हाजमोला की चाय। दिल्ली में आने के बाद, पहले हैदराबाद में था, मैने कई किस्म की चाय चखी। अपने शहर में पढ़ाई के दौरान भी कुछ मुस्लिम दोस्तों के घर नमकीन चाय भी पी। सुना गले में खराश हो तो चाय में नमक डालने से राहत मिलती है। दिल्ली में बाराखम्भा, कनाट प्लेस पर आक्सफोर्ड में बैठकर कई किस्म की चाय का लुत्फ उठाने के बाद ये नई नमकीन पाचक चाय के बारे में सुनकर कौतुहल हुआ। खैर। खासियत और भी थी। मैने कहा। एक कप पिलाओ तो। कप। कभी शहर की सड़क पर चलती बिकती दुकानों में कप मिलता है। पर आदतन कहा। नमकीन चायवाले ने भी अपने काले हो चुके झोले से एक प्लास्टिक का लम्बी थैली निकाली। तकरीबन बीस से तीस प्लास्टिक के गिलास दिखे। मानो मदारी का खेल चल रहा हो, और मैं तमाशबीन बनकर हर हरकत को जादू भरी नजरों से देख रहा था। इस सारे चाय फसाने में मैने उससे इस नमकीन चाय का इतिहास पूछ डाला। पता चला बंगाल की देन है। ऐसा वो कहता है। मैने माना तो नहीं। क्योंकि दार्जिलिंग की चाय किसने न सुनी होगी। और उसे नमकीन बनाकर पीने की कौन सोचे। खैर चाय बेचने वाला बंगाली था। या बांग्लादेशी। चाय के जिस कप या गिलास को उसने निकाला वो महज उतने ही प्लास्टिक से बना होगा जितना रोजाना इस्तेमाल की जाने आधा किलो की पालिथीन में लगता होता। वो डेढ़ इंच का गिलास था, गहराई रही होगी आपकी बीच वाली ऊंगली का आधा। यानि अगर आपने इधर पूजा के बाद प्रसाद के तौर पर चरणामृत खाया, होगा, तो आपको बताए गए गिलास या कप का अंदाजा होगा। खैर चाय दो घूंट थी। क्या ये बेचने की रणनीति थी। कि अगर किसी को न भी पसंद आए तो वो मुंह भी न बिचका पाए। हाथ में चाय का कप थामने के बाद एक पंच सितारा रेस्तरां में करीने से पेश की जाने वाली शराब के पैग का ध्यान आया। एक सौ दस मिली एक पैग में शीशे के गिलास से। और काकटेल में तीन या चार तरह के पेय। वैसी ही गिलास से मिलाए जाते है। वो पेश करने की तरीका ही आपकी प्यास और ललक बढ़ा दे। लेकिन गोरखपुर के मोहद्दीपुर मोहल्ले के इस युवा के हाथों से पकड़ी चाय थामने में और हलक से उतारने दोनों में कठिनता महसूस हो रही थी। दिमाग में तरह तरह के संशय। और चाय के पिछले लिए गए स्वादों की महक और याद। लेकिन सोचा, नया लेकर तो देखा जाए। मैने सारी सोच को किनारे रखते हुए पहला सिप लिया। एक अजब सा स्वाद। ये बताना जरूरी है कि ये आपकी लाल या धूसर रंग की चाय नहीं थी। ये काली चाय थी। शुद्ध असमी चाय जैसी। यानि मेरे हाथ में थी, एक नमकीन काली चाय। ज्यादा लिख गया। लेकिन मेरे पास लिखने को अभी काफी कुछ है। लेकिन इस सबके बारे में कल...तब तक आप अपनी प्रतिक्रियाओं से ये बताइए कि इस किस्सागो में और क्या बचा होगा।
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6 comments:
काली या हरी, नींबू डालकर चाय तो हम पीते हैं अब यह भी आजमा कर देखेंगे पर प्लास्टिक के ग्लास में नहीं ।
घुघूती बासूती
भाई बिना इस्त्माल किए कुछ कह नही सकते।
भई, चाय के तो हम भी शौकीन है, खास तौर पर काली चाय के (हम अक्सर बिना दूध वाली चाय ही पीते है।) श्रीमती जी अक्सर परेशान रहती है, बाजार मे नया टी बैग आया नही कि हमारी शैल्फ़ मे सच जाता है, चाहे वो मिंट हो, जिन्जर, आइरिश, ब्रेकफ़ास्ट या जास्मीन टी, हम हर तरह की चाय पीना पसन्द करते है। आपके किस्से का इन्तज़ार रहेगा। फिर हम भी शुरु हो जाएंगे, किस्सा गोई में।
आप सबकी प्रतिक्रियाओं और संशयो के लिए धन्यवाद। मैं आज ही आगे लिखता पर बाहर जाना पड़ रहा है। सोमवार को आगे की कहानी जारी करूंगा, तब तक पीते रहिए अपनी स्वाद वाली चाय!
बढ़िया चाय। मैंने भी कई बार पी है। यह चाय।
और आगे की बात भी जल्दी ही बता दिजिए।
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