Monday, June 4, 2007

मजूर चाहिए का हजूर

आज सुबह की बात है। नोएडा का लेबर चौराहा। मैं बेल के शर्बत के लिए अपनी गाड़ी चौराहे पर लगे एक ठेले पर रोकता हूं। इधर उधर देखता हूं। बेल वाले को एक गिलास देने को कहता हूं। कि अचानक एक भीड़ मुझे घेर लेती है।

मैं नोएडा से गाजियाबाद हाइवे पर बने लेबर चौराहे, जिसका नाम ही इस वजह से पड़ा है, क्योंकि यहां रोजाना सुबह सुबह मजदूर एक लाइन में भीड़ लगाकर खड़े हो जाता है। रोजाना। ये वे मजदूर है, जो रोज कमाते है, रोज खरीदते है, खाते है, सो जाते है और दोबारा सुबह इसी चौराहे पर पाए जाते है। ये एक गुमनाम भीड़ है। जो हर शहर में मौजूद है। लेकिन सूरज ढलने के बाद से शहर की रोशनी में गायब हो जाती है। ये भवनों को बनाती है और बनने तक उसी में रहबसेरा करती है। और बनने के बाद ये उजड़ जाती है। उजड़ना, बसना इनकी फितरत नहीं, मजबूरी है। ये घुमंतु प्रजाति के भी नहीं है। ये शहरों में आसपास के गावों से आते है। कुछ अपनी जमीन से एक हजार किमी दूर है। तो कुछ एक सौ किमी। लेकिन रोजाना कमाना और उस दिन का जीवन उसी दिन बिसार देना इनकी किस्मत है।

मैंने अपनी दोपहिया से इधर उधर देखा। अचानक भीड़ का दायरा बढ़ गया। आवाजें एक थी। मजूर चाहिए का। साहब कहां जाना है। चलिए अभी चलते है। किस एरिया में। मजूर का जरूरत है का। मैं अवाक। मैने अभी इस शहर में घर बनाने को नहीं सोचा है। सोचता हूं तो अपनी तनख्वाह और ईएमआई के जाल में घुटा महसूस करता हूं। मैने पूछा, कितना लोगे। आवाजे आई कितना लोग चाहिए। मैने कहां रेट का है। किसी ने अस्सी कहा किसी ने धीरे से पिचहत्तर कहा। मैने कहा अब तो दिन का ग्यारह बज गया है। तो भी इतना। मैं भी पूंजी औऱ श्रम के रिश्ते की जोड़ने लगा है। अरे साहब देर तक काम भी तो करेंगे।

ये वो मजूर है, जो सुबह छह बजे से खड़े है, आज काम नहीं मिला है। घर खाली जाने से घर में चूल्हा नहीं जल पाएगा। या जलेगा भी तो बर्तन में पानी ज्यादा होगा। खाना कम। वे पेट काटना सीख चुके है। पर जेब काटना नहीं चाहते है। मेहनत करते है। पर पैसा नहीं पाते।

क्या हम सोच रहे है। क्या हम देख रहे है। शहर के विकास ने अब बने बनाए घर खरीदने की चाहत को परवान चढ़ाया है। कौन बनवाए याऱ। या बनवाना भी है तो, ठेकेदार को दे दो। ठेकेदार, जो एक बीच का जीव है, आपके मकान और मजूर के बीच का। और बीच वाला इस देश में अमीर बहुत हो चला है।

मैंने सबसे हाथ जोड़ा और कहां नहीं मैं तो बेल का शर्बत पीने रूका था। अभी मजूर नहीं चाहिए। आउंगा किसी दिन। एक ऐसा वायदा जो मैं पूरा नहीं करना चाहूंगा। और अगर पूरा कर पाया, तो मैं मजूर से मोल तोल नहीं करूगां।

2 comments:

Udan Tashtari said...

अकसर आसपास कुछ ऐसा वातावरण निर्मित हो जाता है कि आदमी बेबसी के साथ सिर्फ सोचता ही रह जाता है. आपने उन्हें शब्द रुप दे दिया. यह आपके संवेदनशील हृदय के उदगार हैं. नमन!!

mamta said...

ठेकेदार, जो एक बीच का जीव है, आपके मकान और मजूर के बीच का। और बीच वाला इस देश में अमीर बहुत हो चला है।

आज के समय ही सच्चाई ही यही है। जो मजूर लोगों के घर बनाते है वो खुद ही बेघर होते है।

Web Ring

Powered by WebRing.