Tuesday, June 19, 2007

कूड़े में ब्लाग की पेशकश बंद करिए

मीडिया की नई सीमित विधा के पेंच जगजाहिर हो रहे हैं। ब्लाग। एक ऐसा माध्यम जो यूटोपिया में ज्यादा जीता है, अपने विस्तार से पहले अनजानी व्यक्तिगत बहसों में सिमटता जा रहा है। जानते हैं क्यों। क्योंकि संवाद के जिस माध्यम को ब्लाग की दुनिया सर्वव्यापक मानती है, वो नितांत अव्यवहारिक और असंचारी है। टीवी, रेडियो या अखबार के सामने वो केवल एक दिन के विग्यापन के बराबर ठहरता है। और इंटरनेट की दुनिया में वो केवल हलचली झटके जैसा है।

विकसित देशों के ब्लागों की अहमियत इस वजह है, क्योंकि उनके पाठक वर्ग तय है। यहां ऐसा होने के पहले ही खींचतान मची हुई है। व्यक्तिगत दुराग्रहों पर। दुनिया के सबसे मशहूर ब्लाग या तो तकनीकी पर केंद्रित है या तो वे इंसान की व्यक्तिगत जीवन की डायरी है। ऐसे में विचारधारा पर शब्दों की बर्बादी का तुक कहां ठहरता है। जिन समाजों में ब्लाग बहुत खुली हवा में नहीं लिखे जा रहे हैं, वहां भी लिखने वाले दिन प्रतिदिन की हरकतों को दर्ज करके जगह बना रहे हैं। हमने उनकी सीखी कम, किनारा ज्यादा कसा है। एक जमाना था, जब इंटरनेट पर केवल ईमेल चेक किए जाते थे। आज शहरों में ये पोर्नोग्राफी से आगे बढ़कर एकाउंट्स और मनोरंजक वेबसाइटों तक आ पहुंचा है। आज कम्प्यूटर के विश्व पन्ने पर बीबीसी और जागरण है तो जपाक और निनटेंडों भी समान दखल रखते है। हमें जागना होगा। बिकता वो है जो उत्पादक होता है। यहां से उठाकर, वहां से कापी करके खबरों को चेपते रहने से कोई नया उत्पाद नहीं बनता भई।

खैर। जिस रचनात्मकता की जरूरत आज भारत में ब्लाग को थी, वो नदारद है। आज भी सारे ब्लाग प्रचारक यंत्र या विजेट्स विदेशी कंपनियों की देन है। आज भी हमारे पास वो सामग्री नहीं है जो बाजार के सामने बिकने लायक हो। आज भी हम कविता, कहानी या बेहद जाया माने जाने वाली बहसो में पड़ है। और दुनिया में लोगों ने ब्लाग से जुड़ा एक बड़ा व्यवसाय खड़ा कर लिया। मैं बाजार के साथ खड़ा हूं। अमिताभ बिकते है, क्योंकि बाजार के उत्पादों में वे मौजूद है। आप अखरते है, तो आप रचते ही मिट जाने के लिए हैं।

मानिए आज जो भी हिंदी ब्लाग के साथ है, वो बाजार के साथ नहीं है। क्यों। क्योंकि आपने मुफ्त में मिलने वाली एक विधा को केवल अनुत्पादक पैदा करने में लगाया है। उत्पाद वो होता है, जिसपर बाजार विमर्श करें। आपसे कहे कि ऐसा रचो यार। आप अपनी क्रियात्मकता के साथ साथ जगह भी बना पाते। लेकिन अफसोस जिससे थी नाम की कामना, वो मिट गया नाम ही नाम में।

खैर, अभी केवल एक अर्सा ही गुजरा है। अभी तो दौर बाकी है। ब्लाग को प्रचलित करने की बजाय उसे अपने संपर्को से बेचिए। ये बेचना जमीर या ईमान बेचने जैसा नहीं है। उसे अपनी रचनात्मकता की कीमत मिलनी चाहिए। हर रचना की एक हैसियत और कीमत होती है। और फिर एक ऐसा वर्ग ढूंढिए जो आपको देखना और पढना चाहे। छोटे शहरों में ब्लाग केवल एक शब्द है। और इन्ही शहरों के लोगों को बड़े शहरों में आना है। तो क्या आपके वो जानकारी नहीं है, जो इन्हे मदद कर सके। फोकस हो करके ही आप जान सकते है कि क्या पेश किया जाए। बाकी शब्दों से रचना है तो महाभारत और रामायण रचिए। कूड़े में शब्दों को लपेटकर परोसना बंद ही करें तो बेहतर।

5 comments:

अरुण said...

देखिये अभी हम सब व्यस्त है फ़ुरसत नही है कुछ को हिन्दू,मोदी गुजरात,हिन्दूत्व,और बीजेपी तथा आर एस एस पर लिखने से,और बाकी को उनके पढने और जवाब देने से,जो बच गये उन्मे कुछ उन के समर्थन मे कुछ विरोधियो के समर्थन मे
अब वक्त मिलेगा तो सोचेगे आप की राय के बारे मे

Sanjeet Tripathi said...

सार्थक लेखन!!
शुभकामनाएं!!

Shrish said...

अच्छा लिखा आपने, कुछ व्याव्हारिक उदाहरण से समझाएं कि क्या करना चाहिए।

संजय बेंगाणी said...

अच्छा लेख.

अनुनाद सिंह said...

मुझे श्रीश की बात बहुत अच्छी लगी, इसलिये उसे फिर से दुहरा रहा हूँ - यदि आपने उदाहरण देकर अपनी बात रखी होती बात आसानी से पल्ले पड़ जाती। अभी तो एक धुंधला सा चित्र ही बन पाया।

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