Monday, June 25, 2007

गाड़ियों के बीच दिल्ली शहर



दिल्ली में रहना है तो आपको किसी न किसी दिन जरूरत पड़ेगी रेजिडेंस प्रूफ की। रेजिडेंस प्रूफ। एक ऐसा प्रमाण पत्र जो ये बताता है कि आप भला जगह के निवासी है। इसके होने से अपने आप एक सर्वाधिकारवाद के शिकार हो जाते है। ये ऐसा पेपर है जो आपको ये बताता है आप भले ही पैदा कहीं हुए हो, पर आप अब इस शहर में कुछ भी खरीद सकते है। ये खुले बाजार में एक तरह का नियंत्रण है। ऐसा नियंत्रण जो आपको याद दिलाता है कि आप भारत के नागरिक है। नागरिक होने के भले ही एक भी कर्तव्य आप न निभा रहे हो, पर आप है एक अरब बीस तीस करोड़ के देश के एक कागजी नागरिक।

आज सुबह से शाम के बीच दिल्ली के कई चौराहों पर भयंकर जाम मे फसने के बाद महसूस हुआ कि सच में इस शहर में बहुत गाड़ियां है। महसूस करने के लिए एक भाव की जरूरत होती है। जो संजोग से आज जगा। तो कैसे दौड़ रही है ये गाड़िया। अगर यहां रहने वाले बाशिंदे की जनसंख्या पचास लाख मानी जाए, हालांकि कहा जाता है कि दिल्ली का कोई नहीं। सब बाहर से आकर बसे है। बंटवारे के बाद पंजाबी आए, तो काम के लिहाज से बिहार और यूपी वाले। तो भी जो पिछले पचास साल से यहां है, उन्हे बाशिंदा मान ही लें, तो भी इस एक करोड़ बीस लाख वाले शहर में बाहरी जगहों से बसे है एक करोड़ के करीब लोग। ज्यादातर बीस से तीस साल के करीब से। पुराने लोगों के पास पीढ़ियों के हिसाब से गाड़ियां है। फिएट, एम्बैसडर और मारूति वाले। लेकिन जिन लोगों ने पिछले दस साल में यहां अपनी बसेरा बसाया है, वे छोटी गाड़ियों के साथ रखते है एक बड़ी गाडी़।

इस राजधानी में कई ऐसे लोग है जिनके पास सौ पचास गाड़िया भी है। मैने सुना था कि दिल्ली में कहा जाता है कि जिससे आपकी दुश्मनी हो, उसे ट्रांसपोर्टर बनने की सलाह दे दो। सो यहां दुश्मन बहुत है। देश के इस उत्तरी शहर से कही भी जाने के लिए सड़के अच्छी है। और मुनाफा भी।

लौटते है मूल मुद्दे पर। गाड़ी खरीदने के लिए चाहिए होता है रेजिंडेस प्रूफ। अगर मेरी जानकारी अधूरी नहीं है तो आप अगर एनसीआर, गाजियाबाद, नोएडा, गुड़गाव, फरीदाबाद, में रहते है, तो आप दिल्ली की गाड़ी रख तो सकते है, खरीद नहीं। प्राब्लम है रेजिडेस प्रूफ। तो कैसे लोग सड़को पर गाड़ियों मे अटे पड़े है। कैसे आपको आंकड़े बताते है कि इस शहर में पचास लाख गाड़ियां है। मैने कई लोगों से पूछा कि इस शहर से ज्यादा पैसा तो मुंबई और अहमदाबाद में है। तो क्या इतना बम्बार्डमेंट क्यों हैं।

जवाब खोज रहा हूं। मैने अपनी गाड़ी खरीदी, माफ करिएगा, पेशागत मजबूरी है, पचास लाख एक होने का। हां तो गाड़ी खरीदी तो प्रूफ का पेपर कंपनी ने दिया। और दोस्तों के घर के एग्रीमेंट कागज पर गाड़ी मिल गई। शायद पत्रकार होना कभी कभी काम आता है। खैर सवाल का जवाब जानना बाकी है। आपमें में से कोई साथी या पत्रकार कुछ नया बताए तो अच्छा लगेगा। रही बात मेरी तो, वादा है कि मैं जल्द ही आपको बताऊंगा कि क्यों दिल्ली के गाड़ियों की राजधानी।

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