अलीगढ़ में रूकना कुछ ही घण्टे रहा। सो जानने समझने का पूरा वक्त मिल नहीं पाया ।आगे एक ऐसे शहर को जाना था, जहां रेल नहीं जाती है। मैं पूर्वोत्तर राज्यों या जम्मूकश्मीर में नहीं, अपने राज्य उत्तर प्रदेश के एक नगर की बात बता रहा हूं, जहां रेल नहीं जाती।
एटा। एक ऐसा शहर जिसके बारे में आप किसी भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के बाशिंदे से पूछेंगे तो वो कहेगा, हां एटा, वो तो इटावा के पास है कहीं। जैसे शहर का दूसरा मोहल्ला हो। लेकिन वो ये भी बताने में सक्षम नहीं होगा कि इटावा कहां है।
एटा, जिला है। जो आगरा डिवीजन में आता है। इसके उत्तर में बदायूं, पश्चिम में अलीगढ़, हाथरस, मशुरा और आगरा, दक्षिण में मैनपुरी और फिरोजाबाद और पूर्व में फर्रूखाबाद बसा है। तो मैं एटा जा रहा था, पश्चिम में बसे अलीगढ़ से। यहां से एटा जाने के लिए कई साधन थे। सभी सड़को पर चलने वाले। जाहिर है एक जागरूक नागरिक के तौर पर मैने सरकारी बस को ही चुना। क्योंकि दस बीस मिनट की जल्दी के लिए मैं किसी जीप या गाड़ी में दब कुचलकर सौ की गति से उड़ते वाहन में बैठने का जोखिम नहीं लेना चाहता था।
बस ड्राइवर के पीछे की सीट पर बैठा। और गाड़ी ने गति पकड़ी। रोड़ काफी खराब थी। लेकिन मन खिड़की से आती हवा के साथ बहने लगा। रास्ते में एक ढाबे पर बस रूकी। अनाधिकृत तौर पर। पर ये चलता है साहब। आप भारत में सुविधा से ज्यादा चलने को तरजीह देते है। सो हम उतरे। लघुशंका आदि के बाद जो चाय सुड़की गई, वो भारत में बनी बढ़िया चाय को मात देती मालूम होती थी। चाय पीने का शौक है। सो दो गिलास पी ली। केवल चार रूपए में। वैसे दिल्ली की सैकडों की चाय भी अब मंहगी नहीं लगती। शौक जो है।
बस चली। ग्रांड ट्रंक रोड। जिसे शेरशाह सूरी ने बनावाया। सोलहवीं शताब्दी में बनी एक विशाल पथ। जो बंगाल के सोनारगांव से आगरा के सासाराम तक बनी थी। शेरसाह सूरी के गुजर जाने के बाद इसका विस्तार हुआ। आज ग्रांड ट्रंक रोड ढाई हजार किलोमीटर की दूरी पर पसरी है।
पर जिस ग्रांड ट्रंक रोड पर ये बस गुजर रही थी, वो देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश से गुजर रही थी। यानि कि इसे भी इसका गुमान होना ही था। सो बड़े गड्ढ़ो, सड़क हिचकोले खाती बस में हमें रास्ते का अहसास हो गया। बेहद ही खराब थी ये सत्तर किलोमीटर का रास्ता।
खैर एटा पहुंचा। एटा में छह तहसीलें है। तहसील यानि जिले को प्रशासनिक तौर पर नियंत्रित करने के लिए एक ईकाई। हर तहसील का एक प्रशासनिक प्रभारी होता है, जो राज्य लोकसेवा आयोग से चुना जाता है। जिसे उत्तर प्रदेश में पीसीएस कहते है। वो तहसील का प्रशासनिक काम देखता है और उपजिलाधिकारी होता है।
एटा में जो सबसे प्रचलित शब्द है, वो है पकड़। यानि माल जब्त करना नहीं। बल्कि आपका अपहरण। उत्तर प्रदेश के पश्चिमी जिलों में अपराध ज्यादा है। वजह जमीन और राजनौतिक हस्तियों की दखल है। मैने एक जानने वाले से जाना कि पकड़ की कीमत क्या है। यानि फिरौती का हिसाब क्या है।
चौंकिएगा नहीं। क्योंकि ये आपके जीडीपी या पर कैपिटा इनकम से नहीं समझ आएगा। आपको इसके लिए देश के गांवों में जाकर एक समय का राशन खरीद कर खाना होगा। या शहर में दिहाड़ी पर जीते लोगों का जीवन समझना होगा। पकड़ एटा में आए दिन का बात है और पकड़ से छूटने की कीमत भी आम दिन की जद्दोदजहद के बराबर। यानि किसी पकड़ की कीमत दो हजार है तो किसी की एक साइकिल या भैंस।
लेकिन ये काफी है देश के हालात को समझने के लिए। जहां मुबई में एक जवान की मौत के पीछे दो करोड़ की फिरौती की बात है तो, भारत के एक जिले में उसकी जान की कीमत है मात्र दो हजार रूपए। ये असंतुलन बताता है कि देश में दरार कितनी बड़ी है।
मैं एटा दो दिन रहा। निजी काम था। हो गया। आगे का सफर करना था। आगरा पहुंचना था। आगरा गए सालों हो गए थे। ताजमहल को देखने की तमन्ना थी। सो रहिएगा साथ। दिखाता हूं आपको ताज का एक नया चेहरा।
Wednesday, August 22, 2007
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