बीते दिनों पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कुछ शहरों में जाना हुआ। खासकर आगरा। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जिले उतनी ही दूरी पर बसते है जितनी दूरी पर द्वारका से आनंदविहार या कल्याण से छत्रपति शिवाजी टर्मिनल आने में लगते है। यानि एक घण्टे में एक जिले में तो दूसरे घण्टे में दूसरे जिले में। शुरूआत अलीगढ़ से हुई।
सुबह के चार बजे है। दिन पंद्रह अगस्त। मैं अलीगढ़ में हूं। ये शहर अपनी संजीदगी और सरगोशी के लिए पहचाना जाता है। यहां के माहौल में तनाव बना रहता है। कुछ बना बनाया तनाव। लेकिन अलस्सुबह आजादी की साठवीं वर्षगांठ पर शहर की सड़को पर एक परछाई थी। ज्यादातर घरों, दुकानों पर झालर लटकी थी। जिससे चकमक चकमक रोशनी सड़को पर उजाला और अंधेरा कर रही थी। अलीगढ़ के स्वभाव की तरह।
सुबह सुबह मुझे जो दिखा, वो हर छोटे शहर में सुबह देखा जा सकता है। रेलवे स्टेशन के बाहर जिंदगी जिंदा थी। चाय पी कर आगे बढ़ा। तो देखा कि दिन की ही तरह हर निकलने वाले को अपनी ओर खींचने वाले रिक्शेचालक पूछ रहे थे कि कहां जाएंगे। मन खट्टा हो चला है। क्या हर शहर में पता होना जरूरी है। मेरा सफर लम्बा था।
मैं बाहर आकर, रिक्शों वालों को छोड़ता हुआ। पैदल ही बढ़ गया। रेलवे स्टेशन के आगे से बाई तरफ जाकर मैं चलता गया। सड़को सूनसान थी। मकानों, दुकानों पर सजे झालर रोशनी की आंखमिचौली खेल रहे थे। मैं भी आंख ही मिचमिचा रहा था।
जैसा अलीगढ़ के बारे में हमेशा सुनता आया था, उससे अलग अहसास हो रहा था। शांत और सुकून भरा। आज के दिन का अहसास भी माहौल को अलह बना रहा था। पन्द्रह अगस्त। देश को आजाद हुए आज साठ साल हो गए। और अगर इस चीज को समझना हो तो अलीगढ़ से बेहतर क्या होगा।
दिन आगे था। मेरे पास केवल कुछ समय था, शहर समझने को। एक खुलती दुकान पर बैठकर मैने चाय की इच्छा जताई। उसने कसमसाते हुए कहा कि थोड़ी देर लगेगी। मैने कहां कोई बात नहीं। बैठा रहा। फिर चाय वाले ने कहां कहां से आए है। मेरे हाथ में बैग था। और भारत में ये यात्री होने की पहचान है।
बात आगे बढ़ी। पता चला कि चायवाला अलीगढ़ की मूल निवासी है। पिता की परंपरा को आगे बढ़ा रहा है। अलीगढ़ के इतिहास से लेकर आज तक सब बताया। मैने पाया कि भले ही इस शहर में सांप्रदायिक तनाव रह रह कर आता जाता रहता हो, लेकिन सदभाव की मिसाल इस शहर ने भी कायम कर रखी है। राजनैतिक तौर पर तो ये साफ दिखता है। अलीगढ़ की सात विधानसभा सीटों में से छह पर हिंदू प्रतिनिधि चुने गए है। जिनमें से दो तो भाजपा है। ये अलग बात है कि शहर की कमान समाजवादी पार्टी के पास है।
चाय पक चुकी थी। छानी जा रही थी। तलब बढ़ गई थी। अमर उजाला अखबार आ चुका था। देश की आजादी की साठवीं वर्षगांठ की खबरें थी। लोकल पन्नों में हिंसा भी खबरों में थी।
मेरा सफर आगे बढ़ना था। सो इस शहर में मेरा समय पूरा हो चुका था।
आगे जारी रहेगा....
Friday, August 17, 2007
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3 comments:
जारी रखें. अच्छा लिख रहे हैं. अलीगढ़ में क्या गाड़ी बदलने रुके थे? या कोई और वजह थी कि बस चंद घंटों में चल दिये. थोड़ा सा विस्तार दें तो अच्छा.
बहुत खूब ! हमारी भी उत्तर प्रदेश की सैर हो जायेगी ।
घुघूती बासूती
दरअसल जाना एक छोटे शहर और वहां जाने का रेल का रास्ता नहीं है। सो अलीगढ़ में उतरना पड़ा। आगे का रास्ता बस का रहा। मैं लिखकर बताता हूं।
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