Tuesday, May 22, 2007

चिल्लर की अर्थव्यवस्था

फुटकर नहीं है। कहां से लाए चिल्लर। भईया टाफी दे दें। देश में फुटकर की एक अर्थव्यवस्था है। रेजगारी के तौर पर सिक्कों को लोग जेब में रखना पसंद नहीं करते। सो चौराहों पर खड़े हाथ फैलाए भिखारियों की चांदी होती है। भिखारी शब्द भीख मांगने से बना। लेकिन बीते दिनों पता चाला कि वे हमसे ज्यादा कमाते है, उनके फ्लैट है और वे बिन दिखाएं लखपति है। भला हो। ये भी एक तरह का सामाजिक असंतुलन है। खैर। मैं फुटकर सिक्कों पर आता हूं। गोरखपुर में आप पैंतीस रूपयों के सिक्कों के बदले पचास रूपए पा सकते है। मैं प्राचीन सिक्कों की बात नहीं कर रहा। एक रूपए और दो रूपए के नए सिक्कों को लेकर आप एक नया विनिमय का धंधा चला सकते है। आज की तारीख में जब एक और दो रूपए के नोट नजर नहीं आते, ऐसे में सिक्कों की तंगी ने शहर गोरखपुर और शायद आसपास के इलाकों में हाहाकार मचा रखा है। मैने सोचा वजह तलाशी जाए। मैने फुटकर दुकानदारों से लेकर रेस्तरां तक पता किया, सबका ये मानना था कि रेजकारी गायब हो गई है। पहले भिखारी और छोटा सौदा करने वाले सिक्कों को बड़े दुकानदारों को देकर नोट ले जाते थे, अब वे कहां अपना फुटकर सुपुर्द कर रहे है। ये रहस्य है।

एक दिन घण्टाघर के पास मौजूद आभूषण बाजार में जाना हुआ। बीच में एक खबर में पता चला कि जब ब्यूरो आफ इंडियन स्टैण्डर्स ने देश के सैकड़ों दुकानों में सोने के सैम्पल लिए, तो केवल कुछ ही खरा सोना बेचने वाले निकले। मैने अपने घर वालो को समझाया कि वे बीआईएस छाप वाले गहने ही खऱीदे। सो मैं भी ये देखने में लगा था कि कितना सोना खरा है इस बाजार में। अचानक देखा एक ओर एक फटीचर सा आदमी एक भारी झोले के साथ बैठा था। लगा कि कोई गांव का सौदागर है बेटी की शादी के लिए जेवर खरीदने आया होगा। और झोले में सत्तू या पगड़ी रखी होगी। पर झोला बड़ा ही बेमेल सा नजर आ रहा था। फिर उसने झोले में हाथ डाला और पालीथीन के बंडल निकालने चालू किए। हर बंडल में सिक्के के ठेर थे। तकीबन पांच सौ से एक हजार की रेजगारी। मैने उत्सुकतावश दुकानदार से पूछा कि इन सिक्कों का क्या करेंगे। उसने कहा मेरी और चीजों की दुकाने है, वहां काम आएगी। मुझे यकीन न हुआ। सौ दो सौ के सिक्के समझ आते है। मैं वापस चला आया।

मन में कौतुहल मचा हुआ था, सो शाम को अपनी दोपहिया उठाकर फिर दुकान बंद होने के समय उसी बाजार में चला आया। दुकानें बंद हो रही थी, और कारीगर वापस जा रहे थे। एक चाय की दुकान पर देखा कुछ कारीगर बतिया रहे थे। मैने अपनी गाड़ी पहले लगा दी, और धीरे से वहां पहुंचा। बातों बातों में मैने चाय वाले से कहा कि चाय पिला दो, लेकिन सौ का नोट है। उसने कहा अरे बाबू छुट्टा कहां है, सारा छुट्टा तो सोनार बटोर ले रहे है। उसने कारीगरों की ओर देखकर फींकी सी हंसी दी। मैने कहां मतलब। तो एक कारीगर जो ज्यादा बड़बोला था, बोल पड़ा। देखिए भईया सौ सोनार की एक लौहार की। पर लोहार कहां है, ई पता नहीं। मैने कहां मेरे पास तो एक हजार का रेजगारी गुल्लक में पड़ी है। उसने कहा कल लेते आइएगा, मैं सौदा करवा दूंगा। मैने कहा कैसा सौदा। उसने मुझे किनारे ले जाकर कहा कि सेठ जी लोगों को सिक्के चाहिए और आपको इसके बदले ज्यादा रकम मिल जाएगी। मेरा संशय बढ़ता जा रहा था। मैने कहां क्यों। उसने कहां किसी से कहिएगा नहीं। दरअसल सोनार लोग चांदी और सोने के आभूषणों में मिलावट कर रहे हैं। मैने कहां ये को हमेशा होता आया है। नया क्या है। उसने कहां कि वे गिलण्ट के सिक्को को गलाकर आभूषणों में मिला रहे है। ये सबसे सस्ता पड़ता है। मैने पूछा किस मात्रा में। वो बिदक पड़ा। आप सोनार है क्या। मैने कहां नहीं मैं जानना चाहता था। तभी कारीगरों ने इस कारीगर को आवाज लगा दी। और मात्रा का सवाल ठहर गया।

लेकिन एक खुलासा मेरे सामने था। तो सोने और चांदी के बाजार में ये नई मिलावट का किस्सा था। अब आप ही तय करें कि कौन ज्यादा ईमानदार सड़क पर हाथ फैलाने वाला लखपति भिखारी या सोने चांदी में सिक्को की मिलावट वाला व्यापारी। दोनों नें सिक्कों की कालाबाजारी शुरू कर दी है। अब देखना है कि ग्राहक का सिक्का किस काम आता है।

Monday, May 21, 2007

हाजमोला की चाय, गोरखपुर से - 2

चाय मेरे हाथ में थी। नमकीन काली चाय। मन में कई तरह के स्वाद पनप रहे थे। कैसी होगी ये सड़कछाप चाय। वैसे भारत में जो सबसे शानदार चाय बनती और पी जाती है, वो सड़क के किनारे ही बनती और पकती है। तो मैने चाय वाले युवक को बिना पैसे दिए एक नया स्वाद चखने का मन बना लिया। और यकीन जानिए इस नए इरादे के लिए न तो मन तैयार था न तो जबान। खैर युवक इस बीच में अपनी बातें बताता रहा कि कैसे इस चाय से दिन की शुरूआत करने से हाजमा और गैस की दिक्कत नहीं रहती। और तो और आपका दिन भर पेट हल्का बना रहता है। अपने ग्राहकों का हवाला भी उसने दिया। वैसे जिस भी ग्राहक के बारे में वो बता रहा था, वो न तो ब्राण्ड थे और न ही अमीर। हमारे मुहल्ले में सड़क किनारे सब्जी का एक बड़ा बाजार लगता है। और उसके ग्राहक वही सब्जी वाले थे। बातों बातों में चाय वाला अपनी इस इजाद की कहानी भी बता गया कि किस तरह उसने नया सोचा और उसे बेचने में सफल रहा। हालांकि इसके पेटेण्ट के बारे में उसने सोचा भी न होगा। मैने प्लास्टिक के कप को मुंह से लगाया। मध्यम गर्म चाय का पहला स्वाद मेरे होठों से टकराया। और जबान में तीखापन छा गया। लगा जैसे आमपना को गर्म करके पिलाया जा रहा हो। लेकिन ये अनोखा था। दूसरा, तीसरा और चौथे सिप तक ये स्वाद भाता जा रहा था। कुल आठ घूंटों में चाय खत्म थी। और मैं हतप्रभ भाव से चाय वाले को देख रहा था। शिव खेड़ा की मशहूर किताब-यू कैन विन- में एक उदाहरण है। एक ठण्डी चाय बनाने और उसे प्रचलित करने की जद्दोजदह का। आज हर कैफै में कोल्ड टी बिकती है। मैं सोच रहा था कि अगर इस चटपटी चाय को उद्योग में परिवर्तित किया जाए तो बुरा न होगा। पर सवाल यही था। चाय वाले ने मुझे बताया कि पहले पहल उसने ये चाय खुद पी, परिवार को पिलाई और फिर ग्राहकों को, इस विश्वास के साथ कि, ये दवा है, पेट की चटपटी दवा। और धंधा चल निकला। अब उसे कम्पटीशन झेलना पड़ा रहा है। हमारे मुहल्ले में अब तकरीबन चार से पांच चाय वाले है। वैसे वो चाय बनाने की सामग्री नहीं बताता और चाय को हाजमोला की चाय बताकर बेचता है। लेकिन ये सच नहीं लगता। स्वाद से एकबारगी लगता है कि ये काली चाय में हाजमोला डालकर बनाई गई चाय होगी। लेकिन कुछ ऐसा मसाला भी है, जो वो नहीं बताता। ये कोक और पेप्सी जैसा राज है। उघोगधर्मिता का स्पष्ट उदाहरण वो चाय वाला अभी मेरे मुहल्ले तक सीमित है। लेकिन उसका स्वाद आज मेरी जुबान पर है। और पता नहीं कल ये हाजमोला की नई खोज न बन जाए। वैसे मैं जानता हूं कि स्वाद को बता पाना शब्दों में मुश्किल है। लेकिन यकीन जानिए चटपटी चाय का स्वाद अनोखा और अलग जरूर था।

Friday, May 18, 2007

हाजमोला की चाय, गोरखपुर से

चाय गरम चाय। नमकीन चाय। पेट को दुरूस्त रखे चाय। हाजमोला की चाय। चौदह मई की शाम। अपने शहर गोरखपुर में शाम को सब्जी मंडी में हरियाली देख रहा था। कान में ये आवाजें पड़ी। चौंका। देखा एक मध्यम साइज की केटली में एक बीस बाइस साल का लड़का ये पुकार लगा रहा था। चलिए ये बात तो आम है। लेकिन जो शब्द वो कह रहा था, उसका चाय से नाता जोड़ना मुश्किन लगा। पेट को दुरूस्त रखे चाय। कहां बचपन से चाय पीने से गैस, कब्ज और एसिडिटी की शिकायत का राग, कहां पेट को दुरूस्त रखने वाली नमकीन चाय। हाजमोला की चाय। दिल्ली में आने के बाद, पहले हैदराबाद में था, मैने कई किस्म की चाय चखी। अपने शहर में पढ़ाई के दौरान भी कुछ मुस्लिम दोस्तों के घर नमकीन चाय भी पी। सुना गले में खराश हो तो चाय में नमक डालने से राहत मिलती है। दिल्ली में बाराखम्भा, कनाट प्लेस पर आक्सफोर्ड में बैठकर कई किस्म की चाय का लुत्फ उठाने के बाद ये नई नमकीन पाचक चाय के बारे में सुनकर कौतुहल हुआ। खैर। खासियत और भी थी। मैने कहा। एक कप पिलाओ तो। कप। कभी शहर की सड़क पर चलती बिकती दुकानों में कप मिलता है। पर आदतन कहा। नमकीन चायवाले ने भी अपने काले हो चुके झोले से एक प्लास्टिक का लम्बी थैली निकाली। तकरीबन बीस से तीस प्लास्टिक के गिलास दिखे। मानो मदारी का खेल चल रहा हो, और मैं तमाशबीन बनकर हर हरकत को जादू भरी नजरों से देख रहा था। इस सारे चाय फसाने में मैने उससे इस नमकीन चाय का इतिहास पूछ डाला। पता चला बंगाल की देन है। ऐसा वो कहता है। मैने माना तो नहीं। क्योंकि दार्जिलिंग की चाय किसने न सुनी होगी। और उसे नमकीन बनाकर पीने की कौन सोचे। खैर चाय बेचने वाला बंगाली था। या बांग्लादेशी। चाय के जिस कप या गिलास को उसने निकाला वो महज उतने ही प्लास्टिक से बना होगा जितना रोजाना इस्तेमाल की जाने आधा किलो की पालिथीन में लगता होता। वो डेढ़ इंच का गिलास था, गहराई रही होगी आपकी बीच वाली ऊंगली का आधा। यानि अगर आपने इधर पूजा के बाद प्रसाद के तौर पर चरणामृत खाया, होगा, तो आपको बताए गए गिलास या कप का अंदाजा होगा। खैर चाय दो घूंट थी। क्या ये बेचने की रणनीति थी। कि अगर किसी को न भी पसंद आए तो वो मुंह भी न बिचका पाए। हाथ में चाय का कप थामने के बाद एक पंच सितारा रेस्तरां में करीने से पेश की जाने वाली शराब के पैग का ध्यान आया। एक सौ दस मिली एक पैग में शीशे के गिलास से। और काकटेल में तीन या चार तरह के पेय। वैसी ही गिलास से मिलाए जाते है। वो पेश करने की तरीका ही आपकी प्यास और ललक बढ़ा दे। लेकिन गोरखपुर के मोहद्दीपुर मोहल्ले के इस युवा के हाथों से पकड़ी चाय थामने में और हलक से उतारने दोनों में कठिनता महसूस हो रही थी। दिमाग में तरह तरह के संशय। और चाय के पिछले लिए गए स्वादों की महक और याद। लेकिन सोचा, नया लेकर तो देखा जाए। मैने सारी सोच को किनारे रखते हुए पहला सिप लिया। एक अजब सा स्वाद। ये बताना जरूरी है कि ये आपकी लाल या धूसर रंग की चाय नहीं थी। ये काली चाय थी। शुद्ध असमी चाय जैसी। यानि मेरे हाथ में थी, एक नमकीन काली चाय। ज्यादा लिख गया। लेकिन मेरे पास लिखने को अभी काफी कुछ है। लेकिन इस सबके बारे में कल...तब तक आप अपनी प्रतिक्रियाओं से ये बताइए कि इस किस्सागो में और क्या बचा होगा।

Thursday, May 10, 2007

जलेंगे आप जलेंगे हम, जलेगा हमारा चमन

कोलाहल है मचा
धरती रही उबल
इंसान की फितरत में
नहीं है सुधरने का शगल


पृथ्वी तप रही है। इंसान को इसकी चिंता नहीं है। हो भी क्यों। उसके घर में एसी है, कूलर है, पंखा है। हिमखण्ड पिघल रहे है। नदियां उफान पर है। पर इंसान क्या करें। उसके घर, पानी है, फ्रिज है, बर्फ है। खेतों में सूखा पड़ रहा है। पर इंसान के घर खाना है, अनाज है और है ईंधन। तो क्या इसे नियामत की भूल कहें। या किसी एक सभ्यता के कर्मों की बानगी। हवा में तपिश, बादलों में रूखापन, पानी में जलन, माहौल में उमस और पसीने का कंटक। ये बदलाव आ चुका है। दिल्ली की तपती दोपहरी में आप जल रहे है। मुंबई में सागर है, सो तापमान टिका है, लेकिन यही समुद्र लील लेगा, एक दिन एक बड़ी आबादी। धीरे धीरे वो अपना दायरा बढ़ाएगा, और इंसान का चूल्हा चौका सोफा बिस्तरा और दीवाले ढह जाएंगी। कोलकाता में आबादी का समुद्र है, सो एक अकाल वहां इंतजार में है। अकाल से मौत होना जायज है। असंख्यों की मौत। चेन्नई का मरीना बीच सुंदर है। लोग सामान्यता में जीते है। लेकिन पानी उन्हे नहीं बख्शेगा। भारत जैसे देश को गंगा जोड़ती है। गंगा में उफान पाप नहीं धुलेगा, पापी का नाश ही कर देगा। और ये सब करने के बाद गंगा वापस लौट जाएगी। शिव की जटाओं में। डरना जरूरी है। आप नहीं आपका संसार सिसकेगा। पानी और धूप के बीच का नाता टूट जाएगा। और रह जाएगी भाप। गर्म भाप। जो खेतों की माटी में छोटी छोटी दरारें पैदा कर देगी। जो फसलों की हरियाली से जलन रखेगी। जो बादलों के धुंधलके से खार खाएगी। और देगी एक नीरस मौसम। गर्म मौसम। जाड़ों की चाहत और स्वेटर पर चलते हाथ रूक जाएंगे। और बहेगी लू। करीब ही आग से लौ निकलेगी और जंगलों में वो सूखे पत्तों से दोस्ती गांठ कर एक चिरचिराहट के साथ सब कुछ लालिमा में लाकर, काला कर देगी। चिंगारी से कही भी कुछ भी खाक में बदल जाएगा। और आप के चेहरे पर पसीना बना रहेगा।

ये ग्लोबल वार्मिंग है। वैश्विक गर्मी। जो आपके हमारे और हम सबके किए गए प्राकृतिक अत्याचारों का नतीजा है। हमने पेड़ काटे, हमने गाड़िया दौड़ाई, हमने उर्जा का दोहन किया, और उसके बदले दिया पृथ्वी को धुआं और अप्राकृतिक उष्मा। जिसका परिणाम है असंतुलन। हिमखण्डों ने पिघलना शुरू कर दिया है। वे अब सिमट रहे है। अपना अस्तित्व खो रहे है। और अपनी जलधाराओं को सोख रहे है। वे अब गर्मी से हार चुके है। और अपना सारा गुस्सा अब उतारने के करीब खड़े है। तो क्या मानव जाति को अब दिन गिनने चाहिए। क्या अब करने को कुछ बचा है। क्या हम फिर से संतुलित हो पाएंगे।
हां। पर केवल आपके त्यागने से। केवल आपके छोड़ने और लागू करने से। क्या तैयार है कल से साइकिल से आफिस जाने के लिए। चीनी, जापानी ये कर रहे है। पर आप तो उनसे बड़े है। क्या तैयार है बायोडिग्रेडेबिल साधनों पर खाना बनाने के लिए। पर आप तो बिना माइक्रोवेव ओवन के खा ही नहीं सकते है। मैं सबकी बात नहीं करता। पर कारकों की बात जरूरी है। तो क्या कल से मान लूं कि एयरकंडीशनर के बिना आप सो लेंगे आप। कैसे, गर्मी इतनी है, मैं सड़ नहीं सकता। पर यकीन जानिए। आज केवल हर घर घर में गर्मी को रोककर आप अपने नौनिहालों को हीटरी वातावरण में जीने से रोक सकते है। मेरी बात पर नहीं यकीन है, तो आज की दोपहर अपने शहर में नंगे पांव निकल कर देखिए। छाले न प़ड़ जाएं तो कहिएगा। इसे ऐसा आपने बनाया है। और अगर इसे और भयावह नहीं बनाना चाहते तो रूक जाइए। वरना ग्लोबल वार्मिंग का पहला असर आपके पानी, धूप, खाने, ईंधन और जिंदगी पर पड़ेगा। और जिसे झेलने की ताकत आपमें नहीं बची होगी। और एक बात, शहर मकानों से नहीं, हरियाली से भी बनता है। तो कम से कम घर में एक आक्सीजन देने वाला पौधा जरूर लगा लें।

सदी का सामान्य महानायक

सदी के महानायक ने जब कहा कि जुर्म यहां कम है, तो ये बात बहुतों को नागवार गुजरी। सदी के कालपुरुष ने जब मंदिर मंदिर जाकर अपने सुपुत्र और वधु के लिए दुआएं मांगी, तो ये बात उनके कद की नहीं लगी। और सदी के सबसे बड़े कार्यरत कलाकार ने मीडिया को जिस तरह से शादी से दूर रखा, तो ये बात किसी को नहीं भाई। बीते हफ्ते दो ऐसे लेख देखने को मिले , जो अमिताभ बच्चन को एक सामान्य व्यक्ति साबित करने के लिए काफी है। एक व्यक्तिगत सामान्य भारतीय। भारतीय होना गर्व की बात है। लेकिन आप अगर कद्दावर हो, तो आपकी उठक बैठक पर सबकी नजर होती है। सो आप जो चरते है, वो सबके लिए खाद्य पदार्थ हो जाता है। अमिताभ ने जो ऊंचाईयां पाई है, उनमें जो भी किस्से जुड़े है, वे मीडिया की बदौतल ही परवान चढ़े है। चाहे वो उनका नामकरण हो या आकाशवाणी में उनका न चुना जाना। कलकत्ता से मुंबई आना या बरसों संघर्ष करना। आज वे युगपुरूष है, जिसके चारों और आज के युग निर्माता खड़े है। अनिल अंबानी से अमर सिंह तक। अमिताभ ने एक पेपर को कहा कि उनके बेटे की शादी कोई अवार्ड पार्टी नहीं थी। ठीक। लेकिन केवल उन्हे बुलाना जो आपको किसी न किसी मुकाम पर फिल्मी दुनिया में अवार्ड दिला सके, कहां तक सामान्यता है। यश चोपड़ा, करण जौहर और रामगोपाल वर्मा। ये वो फिल्मी चितेरे है, जो आज के फिल्म को बना और आगे बढ़ा रहे है। ये सही मायने में शहंशाह की च्वाइस है। बेटे के करियर का सवाल है क्या करें। अभिषेक को फिल्मी पर्दे पर टक्कर देन वाला कोई अभिनेता उनकी शादी में मौजूद नहीं था। शाहरूख, रितिक, सलमान, आमिर सब नहीं थे। मानते है कि शादी में आपके खास तो होगें ही। पर खास भी फ्यूचर प्लानिंग के लिहाज से चुने हुए। अब बात करीबियत की। कौन कितना करीब है। अमर सिंह कार्ड पर थे, वे बचपन के दोस्त नहीं थे, राजीव गांधी की तरह। पर आज गांधी के हाथ की जगह सपा का साथ अमिताभ के लिए ज्यादा दोस्ताना है। ये बात मैं नहीं मीडिया पर हर दिन आपने देखी है। इलाहाबाद से कोई वास्ता न बचा हो, पर मुलायम सिंह की जनसभा में जया बच्चन शहर की बहू होने का वास्ता देकर वोट मांगती है। शादी में इलाहाबाद में किसी को नहीं बुलाया गया। पर अमिताभ की राजनीति की जंग का पहला मैदान इलाहाबाद था, और सब कुछ सामान्य रहा तो आगे भी होगा। अनिल अंबानी उनके दोस्त है और वे जानते है कि उनके साथ बार बार तिरूपति जाने से वे भागवान के ज्यादा कृपापात्र बने रहेंगे। लोगों की नजर में उनकी अहमियत आज भी कद या पद से नहीं है। वे सार्वकालिक प्रतिभावान कलाकार है। पर वहीं वे एक सामान्यता भी साथ ले कर चलते है। इससे वे लोगों के करीब थे। लेकिन जीवन के दूसरे पारिवारिक फैसले में फ्लाप साबित हुए है। अंधविश्वास, अतिदान, निजता, और दिखावे ने उन्हे भारतीय तो बना दिया है, पर एक फीके डायलाग के साथ। उम्मीद है आने वाले दिनों में हम किसी और तमाशे की ख्वाहिश इस महाकलाकार से नहीं करेंगे।

Wednesday, May 2, 2007

ये छपा था....

ये छपा था....http://mohalla.blogspot.com/2007/04/blog-post_10.html

लोग चुप रहे।
बहसें तमाम हुईं।
हम एक मजहब के हुए।
जिंदगी आम हुई।

मुसलमां होना क्या होता है? ये जानना-समझना केवल फैसलों की छांव में मुश्किल है। दरअसल इस देश की साझा विरासत को जीने के लिए ही गंगा जमुनी तहजीब को रचा गया। आज के समाज में जब विचार पैदा करने वाले ज्यादातर माध्यम अपनी भूमिका से परे हैं, एक बुनियादी सवाल पर सबका चीखना समझदारी लगता है। देश में बीस करोड़ के लगभग के हमारे भाईयों को एक फैसले की दरकार थी, या जरूरत थी, ये कहना मुश्किल है। पर ये जानना जरूरी है कि ये फैसला अभी क्यों आया है। एक ऐसा चुनाव देश के सामने है, गुजर रहा है, जो देश की बदलती तस्वीर से बिल्कुल अलग गति से लड़ा और जीता जाता है। उत्तर प्रदेश पर अभी तक कोर्ट का कोई ऐसा फैसला नहीं आया है, जो यहां के पत्थरनुमा जातिगत ढांचे की तह में जाने का रास्ता दिखाये। सो मौका था कि हम ये जानें कि दरअसल इस प्रदेश में साढ़े तीन करोड़ के करीब मुसलमान हैं, और ये कुछ इलाको में बहुसंख्यक है, तो कुछ में अल्प प्रभावी। अल्पसंख्यक कहना इसलिए उचित नहीं है, क्योंकि जीने के लिए जो बुनियादी जरूरतें चाहिए वो इनके पास नहीं हैं, तो ये एक समुदाय है। एक वजूद को तलाशता समाज। कई बार ठगा जा चुका समाज। और इसके आंतरिक ताने बाने इतने पेचीदा हैं कि आप बाहर से इसे केवल एक झुंड मान सकते है। और इस झुंड का व्यवहार भी एक ही मानते आये हैं। कुंठा और हताशा केवल एक स्थिति को बता सकती है, लेकिन हर दिन खोते जाने का डर ज्यादा भयानक होता है। कहा जा रहा है कि जज साहब के ताल्लुकातों से फैसले के पेंच हैं। ये बात कितनी वज़नदार है, पता नहीं। लेकिन एक बड़ी पार्टी के एजेंडे के तौर पर मुस्लिम विरोध की सीडी का बंटवाया जाना और इसमें कही गयी बातों को फैसले के मर्म से जोड़ कर देखने पर कुछ कुछ साफ होता है। जैसे मुस्लिम आबादी बढ़ा रहे है... और फैसला उन्हे बहुसंख्यक कहता है। ये महज संयोग भी हो सकता है। दूसरी पार्टी की आला महिला नेता इसे साज़‍िश बताती है। सही वक्त पर सही साज़‍िश। वे कहती है, मुसलमानों का पक्ष कमजोर तरीके से रखा गया। सत्तासीन सरकार ने ऐसा जान-बूझ कर किया। सत्तासीन सरकार के राज में हल्के दंगे और मदरसों में हादसे हो चुके हैं। सो वो चुप रहना बेहतर समझती हैं। राहत खुद अदालत से आ गयी। फैसला को बड़ी बेंच ने खुद ही रोक दिया गया। और एक विराम सा लग गया। ये विराम इस समुदाय पर कई बरसों से लगा है। विकास का विराम, पहचान का विराम और खुद को न बता पाने का विराम। कहा जाता है कि इस देश में हर चीज के पीछे राजनीति होती है। तो चश्मा उतार कर भी देखा जाए, तो कहीं न कहीं चुनाव और उन्हें भुनाने या किनारा लगाने की एक और मुहिम जारी है। गंगा में बहता पानी और जमुना के साथ संस्कृति में काफी कुछ बदल चुका है। नहीं बदली है, तो सोच और उसे पुष्ट करती राजनीति।

आपके बीच....मैं भी

अपनी मौजूदगी से हर कोई प्रभाव छोड़ना चाहता है। मैं भी। पत्रकार हूं। पेशा भी है शौक भी। लिखना पढ़ना जारी है। और ये कोशिश भी कि लिख पढ़कर कुछ किया जा सके। मैं नहीं जानता कि पत्रकार अब कोई राह बना पाएगा या नहीं। लेकिन खुद को इतना गुमान है कि पहचान के लिए जीने से बेहतर है किसी काम के लिए जिया जाए। सो जारी हूं...

भव्य

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