Thursday, June 28, 2007

ब्लॉगों की एजेंसी


चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

क्या आपको लगता है कि ब्लाग को बाजार के करीब लाने के लिए किसी नियामक या एजेंसी की जरूरत है।
आपकी प्रतिक्रियाएं एक रास्ता सुझा सकती है।

Monday, June 25, 2007

गाड़ियों के बीच दिल्ली शहर



दिल्ली में रहना है तो आपको किसी न किसी दिन जरूरत पड़ेगी रेजिडेंस प्रूफ की। रेजिडेंस प्रूफ। एक ऐसा प्रमाण पत्र जो ये बताता है कि आप भला जगह के निवासी है। इसके होने से अपने आप एक सर्वाधिकारवाद के शिकार हो जाते है। ये ऐसा पेपर है जो आपको ये बताता है आप भले ही पैदा कहीं हुए हो, पर आप अब इस शहर में कुछ भी खरीद सकते है। ये खुले बाजार में एक तरह का नियंत्रण है। ऐसा नियंत्रण जो आपको याद दिलाता है कि आप भारत के नागरिक है। नागरिक होने के भले ही एक भी कर्तव्य आप न निभा रहे हो, पर आप है एक अरब बीस तीस करोड़ के देश के एक कागजी नागरिक।

आज सुबह से शाम के बीच दिल्ली के कई चौराहों पर भयंकर जाम मे फसने के बाद महसूस हुआ कि सच में इस शहर में बहुत गाड़ियां है। महसूस करने के लिए एक भाव की जरूरत होती है। जो संजोग से आज जगा। तो कैसे दौड़ रही है ये गाड़िया। अगर यहां रहने वाले बाशिंदे की जनसंख्या पचास लाख मानी जाए, हालांकि कहा जाता है कि दिल्ली का कोई नहीं। सब बाहर से आकर बसे है। बंटवारे के बाद पंजाबी आए, तो काम के लिहाज से बिहार और यूपी वाले। तो भी जो पिछले पचास साल से यहां है, उन्हे बाशिंदा मान ही लें, तो भी इस एक करोड़ बीस लाख वाले शहर में बाहरी जगहों से बसे है एक करोड़ के करीब लोग। ज्यादातर बीस से तीस साल के करीब से। पुराने लोगों के पास पीढ़ियों के हिसाब से गाड़ियां है। फिएट, एम्बैसडर और मारूति वाले। लेकिन जिन लोगों ने पिछले दस साल में यहां अपनी बसेरा बसाया है, वे छोटी गाड़ियों के साथ रखते है एक बड़ी गाडी़।

इस राजधानी में कई ऐसे लोग है जिनके पास सौ पचास गाड़िया भी है। मैने सुना था कि दिल्ली में कहा जाता है कि जिससे आपकी दुश्मनी हो, उसे ट्रांसपोर्टर बनने की सलाह दे दो। सो यहां दुश्मन बहुत है। देश के इस उत्तरी शहर से कही भी जाने के लिए सड़के अच्छी है। और मुनाफा भी।

लौटते है मूल मुद्दे पर। गाड़ी खरीदने के लिए चाहिए होता है रेजिंडेस प्रूफ। अगर मेरी जानकारी अधूरी नहीं है तो आप अगर एनसीआर, गाजियाबाद, नोएडा, गुड़गाव, फरीदाबाद, में रहते है, तो आप दिल्ली की गाड़ी रख तो सकते है, खरीद नहीं। प्राब्लम है रेजिडेस प्रूफ। तो कैसे लोग सड़को पर गाड़ियों मे अटे पड़े है। कैसे आपको आंकड़े बताते है कि इस शहर में पचास लाख गाड़ियां है। मैने कई लोगों से पूछा कि इस शहर से ज्यादा पैसा तो मुंबई और अहमदाबाद में है। तो क्या इतना बम्बार्डमेंट क्यों हैं।

जवाब खोज रहा हूं। मैने अपनी गाड़ी खरीदी, माफ करिएगा, पेशागत मजबूरी है, पचास लाख एक होने का। हां तो गाड़ी खरीदी तो प्रूफ का पेपर कंपनी ने दिया। और दोस्तों के घर के एग्रीमेंट कागज पर गाड़ी मिल गई। शायद पत्रकार होना कभी कभी काम आता है। खैर सवाल का जवाब जानना बाकी है। आपमें में से कोई साथी या पत्रकार कुछ नया बताए तो अच्छा लगेगा। रही बात मेरी तो, वादा है कि मैं जल्द ही आपको बताऊंगा कि क्यों दिल्ली के गाड़ियों की राजधानी।

Thursday, June 21, 2007

बाजार में बिकने के लिए तैयार ब्लाग-2

क्या किया जाए। कैसे बिना हाथ पांव मारे ही ब्लाग में प्रचारों की झड़ी लग जाए। रोजाना आप दो से चार घण्टे इंटरनेट से जूझते रहते है। दो चार लेखों को पढ़ते है। एक दो लिखकर छाप मारते है। और एक सामान्य ब्लागर हर घंटे ये देखने में ही बिता देता है कि कितने हिट आए औऱ कितने कमेंट। सारा फसाना इसी रूझान का है। मतलब आप अपने ब्लाग पर तो लोगों को देखना चाहते है, लेकिन आप कितना दूसरों के ब्लाग पर समय बिताते है। क्या रह रह कर आपको अपनी ओर खींचने वाले ब्लाग आपको कभी नीरस तो कभी बेकार से लगते है। क्यों। क्योंकि ज्यादातर ब्लाग चलाने वाले भी आपकी ही भावना से लिख लिखा रहे है। यानि ब्लाग चला रहे है।

एक ऐसा ब्लाग जो आपकी रूचि से ज्यादा किसी खास वर्ग, विशेष या उत्पाद पर टिका हो, निश्चित ही सीमित होगा। लेकिन ये सीमितता मल्टीप्लेक्स वाले दर्शक जैसी है। जो अमीर है और खर्चने वाला भी। मानिए आप साफ्टवेयर इंफार्मेशन का एक ब्लाग चला रहे है, तो आपको देखना होगा कि आपकी जानकारी साफ्टवेयर जगत तक कैसे पहुंचे। इंटरनेट के संजाल पर ये आसान है। लेकिन ब्लाग की दुनिया में मुश्किल।

दूसरा जो सबसे कारगर उपाय होगा ब्लाग को आगे बढ़ाने का वो होगा, जुड़ाव। जुड़ाव, सुविधाओं से। सुविधा, बिल जमा करने की, कर जमा करने की, टिकट लेने की, गैस की पर्ची की, और मोहल्ले की समस्या को उठाने की।

मानिए आपके मोहल्ले में कई जन सुविधाओं की समस्या है। तो ऐसे में अगर एक ऐसा ब्लाग हो, जो रोजना किसी न किसी नागरिक की समस्या को लिख रहा हो, और इससे आप अपने शहर की नगरपालिका को अवगत कराएं कि वो कागजों के रखरखाव से ऊपर उटकर वर्चुअल सरोकार पर आ गया है। तो क्या आपको नहीं लगता कि ये सामुदायिक होगा, और मोहल्ले के छोटे दुकानदार शायद इसके लिए विग्यापन भी मुहैय्या कराएं।

देखिए आसमान को बड़ा मत बनाइए। किसी मेट्रिमोनियल साइट, नौकरी की वेबसाइट और बड़े उत्पाद के लिंक को खोदने की चाह न आपमें है और न ही किसी नवोचर चिट्ठेकार में। सो वहां से शुरू किया जाए, जहां जगह बनानी आसान है। और इसके लिए आपका नगर, मोहल्ला, चौराहा और रिश्तेदार सबसे करीबी जरिया है, जो आपको बिन झिझके स्वीकारते है।

दूध, सब्जी, ब्रेड, अखबार, अंडे ऐसी वस्तुए है जो आप रोज खरीदते है। और रोज की खरीदारी से जुड़ा है आपका समय। तो क्या इनके मोल तोल और इनकी मौजूदगी के बारे में बताकर आप लोगों का सीधा ध्यान नहीं खींच सकते। मुश्किल है। पर इंसानी दिमाग के आगे कुछ नहीं है जनाब।

खैर मैं हर दिन अपने दिमाग को खोद खोद कर सोच में लगा हूं कि कैसे। कैसे हम किसी रचनात्मक अवधारणा को एक बाजार में बदल सकते है। क्या बाजार सत्य है। नहीं, दरअसल बाजार की कीमत से तय होता है आपका मूल्यांकन। और मूल्यांकन ही सत्य है।

Wednesday, June 20, 2007

बाज़ार में बिकने के लिए तैयार ब्लाग-1

सवाल उठता है कि ब्लाग को बाजार में बेचा कैसे जाए। क्या प्रचार की बाट जोही जाए। कि गूगल के जरिए ये इंतजार किया जाए कि वो कमाए तो हम पाएं। आज जितने भी जनसंचार माध्यम है वे अपनी कमाई के लिए बाजार के प्रचार पर पूरी तौर पर निर्भर है। और जो सीमित जनसंचार के माध्यम है, जैसे सामुदायिक रेडियो, वे केवल स्वांतह सुखाय जन हिताय से गुजारा करते है। देखा जाए तो उद्देश्य दोनों के पास है। जनसंचार के बड़े माध्यम, अखबार, रेडियो और टीवी रोजमर्रा के लिए जो पैदा करते है, उनका जीवन चलाने में जो योगदान है, वहीं सामुदायिक माध्यम का छोटे इलाकों में अनाज, पशु व्यापार और मौसम में है। तो ब्लाग का उपयोग किस लिए है। जरा खुद से पूछिए कि आप क्यों चला रहे है ब्लाग।

जबाव आते ही आपको पता लगेगा कि आप किसी व्यवसाय के लिए ये जद्दोजहद कर ही नहीं रहे है। इसीलिए इसे कैसे बेचा जाए, ये आपको पता ही नहीं है। हां देखादेखी में आपने भी गूगल और अन्य प्रचार स्रोत लगा रखें है। आज हिंदी में ऐसे कई ब्लाग है, जो रोजाना सैकड़ों हिट पाते है। लेकिन बाजार इन सूचकांको को तव्वजों नहीं दे रहा। क्यों।

वजह है अनियंत्रित विकास। तकनीकी और बाजार में बिकने वाले उत्पादों से दूरी। और सबसे बड़ी नैतिक दिक्कत है भाषा की क्लिष्टता औऱ दुरूहता। एक एक करके आता हूं।


क्या आपने ऐसा कोई ब्लाग देखा है, जिसे आप अनोखा या विशेष कह सकें। मैं जानता हूं कि आप कहेंगे, कई है। लेकिन समझे। कविता, कहानी, किस्से,. रचनाए और तरह तरह की लेखनी को कैसे बाजार मिल सकते है, जब इस देश में हिंदी साहित्य को स्वांतह सुखाय के लिए आगे बढ़ाया जा रहा है। ब्लाग में कंटेंट क्या हो। ये तय करने से पहले ये जाने कि क्या जरूरत है आपके आसपास। आप खुद के सुख और दुख के लिए जो चाहे रचें, लेकिन बेचने के लिए चुना गया विषय ऐसा हो जिसमें आपकी रूचि कम, खरीदार की ज्यादा हो। जैसे आपके मुहल्ले में बिजली जाती रहती है। तो क्यों न आप एक स्थानीय इनवर्टर कंपनी से बात करके उसके उत्पाद के लिए और देश को बताने के लिए लिखें। ये एडवर्टोरियल जैसा होगा। लेकिन आप कहेंगे कि ये तो दलाली जैसा है। मैं विस्तार से बताता हूं।

देश में बिजली बड़ी समस्या है। और इसके लिए गैर परंपरागत ऊर्जा सोत्रो पर निर्भरता की बात बार बार कही जाती है। आपने क्या किसी को ये बताया है कि इस नान कंवेंनशनल उर्जा के फायदे औऱ नुकसान क्या क्या है। और क्या आपने ये सोचा है कि आप केवल इस विषय पर अगर एक महीने तक लिखते रहे और फिऱ इस और किसी सरकारी या निजी कंपनी ने ध्यान दिया, तो वो आपको अपना प्रचारक मान सकती है। और फिर आप उनके लिए एक ब्लाग चला सकते है। कंपनियों की वेबसाइटें होती है। लेकिन आपके ब्लाग की लोकप्रियता औऱ आपकी सस्ती प्रस्तुति किसी भी छोटे निवेश को आकर्षित कर सकता है।

ये सारे प्रयोग उन सभी विषयों पर किए जा सकते है, जो आपके आस पास से जुड़े है। केवल ध्यान इतना रखना होगा कि आपको पढने वाले लोकल लोग ज्यादा हो। इसके लिए सीधा सा जरिया है लोकल प्रचार। आप किसी भी दिन किसी अखबार में ढ़ाई सौ रूपए खर्च करके अपने ब्लाग को सौ पचास लोगों में पहुंचा सकते है। बाकी काम आपके ब्लाग पर मौजूद सामग्री और वर्ड आफ माउथ से हो जाएगा।

आगे आने वाले दिनों में मैं कोशिश करूंगा कि आपको तथ्यो से अवगत करा सकूं। आपके सुझाव और सलाह इस हिंदी ब्लाग जगत को उत्पादक और उर्वरा बना सकते है। सो जारी रहिए। एक सूचनात्मक ब्लाग के साथ।

Tuesday, June 19, 2007

कूड़े में ब्लाग की पेशकश बंद करिए

मीडिया की नई सीमित विधा के पेंच जगजाहिर हो रहे हैं। ब्लाग। एक ऐसा माध्यम जो यूटोपिया में ज्यादा जीता है, अपने विस्तार से पहले अनजानी व्यक्तिगत बहसों में सिमटता जा रहा है। जानते हैं क्यों। क्योंकि संवाद के जिस माध्यम को ब्लाग की दुनिया सर्वव्यापक मानती है, वो नितांत अव्यवहारिक और असंचारी है। टीवी, रेडियो या अखबार के सामने वो केवल एक दिन के विग्यापन के बराबर ठहरता है। और इंटरनेट की दुनिया में वो केवल हलचली झटके जैसा है।

विकसित देशों के ब्लागों की अहमियत इस वजह है, क्योंकि उनके पाठक वर्ग तय है। यहां ऐसा होने के पहले ही खींचतान मची हुई है। व्यक्तिगत दुराग्रहों पर। दुनिया के सबसे मशहूर ब्लाग या तो तकनीकी पर केंद्रित है या तो वे इंसान की व्यक्तिगत जीवन की डायरी है। ऐसे में विचारधारा पर शब्दों की बर्बादी का तुक कहां ठहरता है। जिन समाजों में ब्लाग बहुत खुली हवा में नहीं लिखे जा रहे हैं, वहां भी लिखने वाले दिन प्रतिदिन की हरकतों को दर्ज करके जगह बना रहे हैं। हमने उनकी सीखी कम, किनारा ज्यादा कसा है। एक जमाना था, जब इंटरनेट पर केवल ईमेल चेक किए जाते थे। आज शहरों में ये पोर्नोग्राफी से आगे बढ़कर एकाउंट्स और मनोरंजक वेबसाइटों तक आ पहुंचा है। आज कम्प्यूटर के विश्व पन्ने पर बीबीसी और जागरण है तो जपाक और निनटेंडों भी समान दखल रखते है। हमें जागना होगा। बिकता वो है जो उत्पादक होता है। यहां से उठाकर, वहां से कापी करके खबरों को चेपते रहने से कोई नया उत्पाद नहीं बनता भई।

खैर। जिस रचनात्मकता की जरूरत आज भारत में ब्लाग को थी, वो नदारद है। आज भी सारे ब्लाग प्रचारक यंत्र या विजेट्स विदेशी कंपनियों की देन है। आज भी हमारे पास वो सामग्री नहीं है जो बाजार के सामने बिकने लायक हो। आज भी हम कविता, कहानी या बेहद जाया माने जाने वाली बहसो में पड़ है। और दुनिया में लोगों ने ब्लाग से जुड़ा एक बड़ा व्यवसाय खड़ा कर लिया। मैं बाजार के साथ खड़ा हूं। अमिताभ बिकते है, क्योंकि बाजार के उत्पादों में वे मौजूद है। आप अखरते है, तो आप रचते ही मिट जाने के लिए हैं।

मानिए आज जो भी हिंदी ब्लाग के साथ है, वो बाजार के साथ नहीं है। क्यों। क्योंकि आपने मुफ्त में मिलने वाली एक विधा को केवल अनुत्पादक पैदा करने में लगाया है। उत्पाद वो होता है, जिसपर बाजार विमर्श करें। आपसे कहे कि ऐसा रचो यार। आप अपनी क्रियात्मकता के साथ साथ जगह भी बना पाते। लेकिन अफसोस जिससे थी नाम की कामना, वो मिट गया नाम ही नाम में।

खैर, अभी केवल एक अर्सा ही गुजरा है। अभी तो दौर बाकी है। ब्लाग को प्रचलित करने की बजाय उसे अपने संपर्को से बेचिए। ये बेचना जमीर या ईमान बेचने जैसा नहीं है। उसे अपनी रचनात्मकता की कीमत मिलनी चाहिए। हर रचना की एक हैसियत और कीमत होती है। और फिर एक ऐसा वर्ग ढूंढिए जो आपको देखना और पढना चाहे। छोटे शहरों में ब्लाग केवल एक शब्द है। और इन्ही शहरों के लोगों को बड़े शहरों में आना है। तो क्या आपके वो जानकारी नहीं है, जो इन्हे मदद कर सके। फोकस हो करके ही आप जान सकते है कि क्या पेश किया जाए। बाकी शब्दों से रचना है तो महाभारत और रामायण रचिए। कूड़े में शब्दों को लपेटकर परोसना बंद ही करें तो बेहतर।

Friday, June 8, 2007

मैं एक पत्रकार हूं

मुझे जिंदा रहना है
मुझे नौकरी करनी है।
एक बार किसी बात में
मां ने कहा कि जीवन में ऐसा
करना जो नाम रोशन करने जैसा हो
मैने छोड़ दी एक चैन की सरकारी नौकरी

और

अब हूं एक मोर्चे पर।

मैं सैनिक नहीं हूं।
होता तो घरवाले हर हादसे पर सिहर जाते
पत्नी और बच्चे एक आम सी जिंदगी में बिसर जाते

मैं अधिकारी भी नहीं।
होता तो घूसखोर होकर सो जाता
देश का खाकर परिवार को भागी बनाता

मैं नेता भी नहीं
होता तो सफेदी से कालिख छुपाता
रोजाना वादों से दुनिया को बहलाता

मैं अभिनेता भी नहीं
रोज एक किरदार में जीता
रोज एक किरदार को सीता
लेकिन रहता बिना भाव के
होता किसी के लिए राह का कांटा

मैं वैज्ञानिक भी नहीं
सोचता और बनाता देश के लिए
लेकिन मेरी अहमियत खुद के लिए
केवल एक सामान्य समर्पित गुमनाम
शख्स की होती, मैं खुश न होता।

मैं क्या हूं।
मैं क्यों हूं।
मैं कैसा हूं।


पर जानते है मैं खुश हूं।

मैं एक पत्रकार हूं।

जो, सबके लिए सोता जागता है
जो, आपकी चिंता को अपना बनाता है
जो, सबसे आपके लिए लड़ने को तैयार है
जो, नाम से शुरू होकर काम में खो जाता है
रोजाना, खास होकर मैं अब भी आम हूं।

मैं पत्रकार हूं।

Monday, June 4, 2007

मजूर चाहिए का हजूर

आज सुबह की बात है। नोएडा का लेबर चौराहा। मैं बेल के शर्बत के लिए अपनी गाड़ी चौराहे पर लगे एक ठेले पर रोकता हूं। इधर उधर देखता हूं। बेल वाले को एक गिलास देने को कहता हूं। कि अचानक एक भीड़ मुझे घेर लेती है।

मैं नोएडा से गाजियाबाद हाइवे पर बने लेबर चौराहे, जिसका नाम ही इस वजह से पड़ा है, क्योंकि यहां रोजाना सुबह सुबह मजदूर एक लाइन में भीड़ लगाकर खड़े हो जाता है। रोजाना। ये वे मजदूर है, जो रोज कमाते है, रोज खरीदते है, खाते है, सो जाते है और दोबारा सुबह इसी चौराहे पर पाए जाते है। ये एक गुमनाम भीड़ है। जो हर शहर में मौजूद है। लेकिन सूरज ढलने के बाद से शहर की रोशनी में गायब हो जाती है। ये भवनों को बनाती है और बनने तक उसी में रहबसेरा करती है। और बनने के बाद ये उजड़ जाती है। उजड़ना, बसना इनकी फितरत नहीं, मजबूरी है। ये घुमंतु प्रजाति के भी नहीं है। ये शहरों में आसपास के गावों से आते है। कुछ अपनी जमीन से एक हजार किमी दूर है। तो कुछ एक सौ किमी। लेकिन रोजाना कमाना और उस दिन का जीवन उसी दिन बिसार देना इनकी किस्मत है।

मैंने अपनी दोपहिया से इधर उधर देखा। अचानक भीड़ का दायरा बढ़ गया। आवाजें एक थी। मजूर चाहिए का। साहब कहां जाना है। चलिए अभी चलते है। किस एरिया में। मजूर का जरूरत है का। मैं अवाक। मैने अभी इस शहर में घर बनाने को नहीं सोचा है। सोचता हूं तो अपनी तनख्वाह और ईएमआई के जाल में घुटा महसूस करता हूं। मैने पूछा, कितना लोगे। आवाजे आई कितना लोग चाहिए। मैने कहां रेट का है। किसी ने अस्सी कहा किसी ने धीरे से पिचहत्तर कहा। मैने कहा अब तो दिन का ग्यारह बज गया है। तो भी इतना। मैं भी पूंजी औऱ श्रम के रिश्ते की जोड़ने लगा है। अरे साहब देर तक काम भी तो करेंगे।

ये वो मजूर है, जो सुबह छह बजे से खड़े है, आज काम नहीं मिला है। घर खाली जाने से घर में चूल्हा नहीं जल पाएगा। या जलेगा भी तो बर्तन में पानी ज्यादा होगा। खाना कम। वे पेट काटना सीख चुके है। पर जेब काटना नहीं चाहते है। मेहनत करते है। पर पैसा नहीं पाते।

क्या हम सोच रहे है। क्या हम देख रहे है। शहर के विकास ने अब बने बनाए घर खरीदने की चाहत को परवान चढ़ाया है। कौन बनवाए याऱ। या बनवाना भी है तो, ठेकेदार को दे दो। ठेकेदार, जो एक बीच का जीव है, आपके मकान और मजूर के बीच का। और बीच वाला इस देश में अमीर बहुत हो चला है।

मैंने सबसे हाथ जोड़ा और कहां नहीं मैं तो बेल का शर्बत पीने रूका था। अभी मजूर नहीं चाहिए। आउंगा किसी दिन। एक ऐसा वायदा जो मैं पूरा नहीं करना चाहूंगा। और अगर पूरा कर पाया, तो मैं मजूर से मोल तोल नहीं करूगां।

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