क्या किया जाए। कैसे बिना हाथ पांव मारे ही ब्लाग में प्रचारों की झड़ी लग जाए। रोजाना आप दो से चार घण्टे इंटरनेट से जूझते रहते है। दो चार लेखों को पढ़ते है। एक दो लिखकर छाप मारते है। और एक सामान्य ब्लागर हर घंटे ये देखने में ही बिता देता है कि कितने हिट आए औऱ कितने कमेंट। सारा फसाना इसी रूझान का है। मतलब आप अपने ब्लाग पर तो लोगों को देखना चाहते है, लेकिन आप कितना दूसरों के ब्लाग पर समय बिताते है। क्या रह रह कर आपको अपनी ओर खींचने वाले ब्लाग आपको कभी नीरस तो कभी बेकार से लगते है। क्यों। क्योंकि ज्यादातर ब्लाग चलाने वाले भी आपकी ही भावना से लिख लिखा रहे है। यानि ब्लाग चला रहे है।
एक ऐसा ब्लाग जो आपकी रूचि से ज्यादा किसी खास वर्ग, विशेष या उत्पाद पर टिका हो, निश्चित ही सीमित होगा। लेकिन ये सीमितता मल्टीप्लेक्स वाले दर्शक जैसी है। जो अमीर है और खर्चने वाला भी। मानिए आप साफ्टवेयर इंफार्मेशन का एक ब्लाग चला रहे है, तो आपको देखना होगा कि आपकी जानकारी साफ्टवेयर जगत तक कैसे पहुंचे। इंटरनेट के संजाल पर ये आसान है। लेकिन ब्लाग की दुनिया में मुश्किल।
दूसरा जो सबसे कारगर उपाय होगा ब्लाग को आगे बढ़ाने का वो होगा, जुड़ाव। जुड़ाव, सुविधाओं से। सुविधा, बिल जमा करने की, कर जमा करने की, टिकट लेने की, गैस की पर्ची की, और मोहल्ले की समस्या को उठाने की।
मानिए आपके मोहल्ले में कई जन सुविधाओं की समस्या है। तो ऐसे में अगर एक ऐसा ब्लाग हो, जो रोजना किसी न किसी नागरिक की समस्या को लिख रहा हो, और इससे आप अपने शहर की नगरपालिका को अवगत कराएं कि वो कागजों के रखरखाव से ऊपर उटकर वर्चुअल सरोकार पर आ गया है। तो क्या आपको नहीं लगता कि ये सामुदायिक होगा, और मोहल्ले के छोटे दुकानदार शायद इसके लिए विग्यापन भी मुहैय्या कराएं।
देखिए आसमान को बड़ा मत बनाइए। किसी मेट्रिमोनियल साइट, नौकरी की वेबसाइट और बड़े उत्पाद के लिंक को खोदने की चाह न आपमें है और न ही किसी नवोचर चिट्ठेकार में। सो वहां से शुरू किया जाए, जहां जगह बनानी आसान है। और इसके लिए आपका नगर, मोहल्ला, चौराहा और रिश्तेदार सबसे करीबी जरिया है, जो आपको बिन झिझके स्वीकारते है।
दूध, सब्जी, ब्रेड, अखबार, अंडे ऐसी वस्तुए है जो आप रोज खरीदते है। और रोज की खरीदारी से जुड़ा है आपका समय। तो क्या इनके मोल तोल और इनकी मौजूदगी के बारे में बताकर आप लोगों का सीधा ध्यान नहीं खींच सकते। मुश्किल है। पर इंसानी दिमाग के आगे कुछ नहीं है जनाब।
खैर मैं हर दिन अपने दिमाग को खोद खोद कर सोच में लगा हूं कि कैसे। कैसे हम किसी रचनात्मक अवधारणा को एक बाजार में बदल सकते है। क्या बाजार सत्य है। नहीं, दरअसल बाजार की कीमत से तय होता है आपका मूल्यांकन। और मूल्यांकन ही सत्य है।