
दिल्ली में चलना है तो सभंलना जरूरी है। और अगर सड़क पर किसी ब्लूलाइन बस के आस पास है तो दूरी जरूरी है। सरकार भी दूरी के फार्मूले को अपना रही है। आज ही दिल्ली सरकार की मुखिया ने कहा कि धीरे धीरे सड़कों पर से साढ़े चार हजार ब्लू लाइन बसों को हटा दिया जाएगा। तो मुसाफिर चलेंगे कैसे। इसके लिए होंगी। हाई कैपेसिटी लो फ्लोर बसों को इनकी जगह लगाया जाएगा। तो यानि दिल्ली को इस रौंदती आफत से निजात दिलाने के लिए करोड़ो खर्च होंगे।
क्यों ब्लू लाइन बस वाले नहीं मानते कि उनसे ऊपर सड़क पर कोई है। क्यों वे एक चक्कर को कम समय में पूरा करना चाहते है। इस देश में करोड़ों लोगों को दिल्ली की इस खतरनाक पीली नीली बस में सफर करने का मौका नहीं मिला होगा।
दरअसल सड़को पर नम्बर रूटों से दौड़ने वाली ब्लू लाइन बसों को एक दिन में चार से पांच चक्कर लगाने की अनुमति होती है। लेकिन इससे न तो रोजाना का खर्चा निकलता है और न ही थानों में दी जाने वाला सुविधा शुल्क।
तीन हजार बसें रोजाना लाखों लोग को दिल्ली के एक कोने से दूसरे कोने तक ले जाती, ले आती है। इनका किराया भी दो, पांच सात और दस रूपए। एक ऐसे शहर में जहां रहने के लिए मकान हजारों में हो, महीने के दौड़ भाग का किराया दौ सौ के करीब हो तो, बात अखरती नहीं है।
दिल्ली के हर चौक से गुजरने वाली इस पीली नीला बसों के मालिक सफेद कपड़े वाले लोग है। या उनके गुमनाम रिश्तेदार। एक एक मालिक के पास 20-40 गाड़िया है। और है हर रूट के थानेदार का पर्सनल नम्बर।
तो सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद जिन चौराहों पर धड़ाधड़ चालान कट रहे थे, उनपर ही कैसे बसें लोगों पर चढ़ रही है। क्या सरकार इसे जान बूझकर बर्दाश्त कर रही है। जिससे मंहगी हाई कैपेसिटी लो फ्लोर बसों के लिए आधार बनाया जा सके।
ब्लू लाइन बसों के रोडाना रवैये को सुधारने के तरीके अभी भी सरकार के पास है। बशर्ते अधिकारियो की जेब में अब कागज ज्यादा और पैसे कम हो। हर ब्लू लाइन पर सरकारी ट्रेंड स्टाफ और स्पीड गवर्नर, एक ऐसी मशीन जो गति को नियंत्रित करती है, लगाकर बसों को समझदार बनाया जा सकता है।
रही बात ट्रैफिक नियमों के पालन की तो डर अभी भी बरकरार है। लेकिन सड़कों पर नाचती ब्लू लाइन बसों का डर इस नियम के डर से ज्यादा महसूस होने लगा है।

