अपने को जानने समझने के लिए अब तक भारतीय परंपरा में ध्यान ही सबसे बड़े माध्यम के तौर पर देखा जाता रहा है। लेकिन हाल के सालों में बाजार में आ गई है स्व-विकास, स्व- मूल्यांकन और लाइफ और प्रोफेशनल मैनेजमैंट की हजारों किताबें। तो क्या है इन किताबों में, जो दिखा रहा है हर सफल-असफल इंसान को एक सपना। थोड़ा पीछे चलना होगा। व्यक्ति को उसके व्यवहार में कुशल और आसपास ज्यादा चर्चा दिलाने के लिए 1937 में डेल कार्नेगी ने लिखी एक किताब। हाऊ टू विन फ्रेंड्स एंड इंफ्लूएंस पीपुल्स। इस किताब को पढ़कर आप ये जानेंगे कि कुछ चीजों को अपनाकर आप कैसे जीततें है अपने का मन। और कुछ चीजों को बरत कर आप हो जाते है चर्चित।
ये तो महज एक शुरूआत थी। इस किताब की अपार सफलता के बाद, तो मानो इंसान की सबसे बड़ी ललक को भुनाने के लिए छपीं थड़ाथड़ किताबें। वैसे पश्चिमी देशो में लोगों को अमीर बनाने वाली नेपेलियन हिल और स्वेट मार्टिन की किताबें मौजूद थी। लेकिन इंसान को अमीर बनाने की चाहत को भुनाने की इस कड़ी के बाद जोर व्यक्तित्व विकास को बेहतर बनाने पर रहा। भारत में इसे लेकर जो चर्चा छिड़ी, वो यू कैन विन से परवान चढ़ी। इस किताब में सैकड़ों किस्से थे, जो इंसान की क्षमता और चाहत के बीच एक पुल बना रहे थे। इसने वो कर दिखाया, जो तब वक्त की जरूरत थी। यानि कि जागरूकता। अपने अंदर छुपे गुणों की। उनको खोजने की। और ये एक हद तक नैतिक ज्यादा रही।
लेकिन ये खोज ज्यादा आगे नहीं बढ़ पाई। किताब में किस्सागो बेहतर था, लेकिन आज के युवा और व्यस्त भारत ने इसे पढ़कर किनारे रख दिया। नैतिकता से क्षमता के नाते को समझाने में ये किताब नाकामाब रही। मैनेजमेंट शायद सबसे बड़ी रूकावट थी। हर कहीं ऐसा कारीगरों, या कहें कि प्रोफेशनल्स की जरूरत थी, जो प्रबंधन कर सकें। लेकिन भारतीय विकसित कामगारों के पास निजी जीवन से व्यवसायिक जीवन तक किसी तरह का खास प्रबंधन नहीं था। वे अनुशासित या अनुशासित तो थे, पर विचारों की गढ़ी-पढ़ी श्रंख्ला से कैद नहीं। वे नियम बनाने में यकीन तो रखते है, लेकिन जरूरत पर उन्हे तोड़ने में गुरेज नहीं करते। सो अमीर बनाने के ख्वाब, नैतिकता के क्षमतावान सबक, सब पीछे छूटे रह गए। नया मंत्र था मैनेजमेंट।
हर संभव कोशिश की बड़े पदों पर बैठे, प्रबंधन स्कूलों में पढ़ाने वाले अध्यापकों और पालिसी के क्रियांवित करवने वालों ने। इस तरह की किताब छापी जाए कि वो किसी तरह माहौल को बनाए। एक ऐसा माहौल जो अपने आप कारीगर पैदा कर दे। कठिन सोच। लेकिन हार्वर्ड बिजनेस रिव्यू गैलप जैसी तमाम बड़ी शोध संस्थओं ने समय समय पर शोध के बाद मैनेजमेंट से जुड़ा अपने अपने निष्कर्ष दिए। ये कहीं न कहीं किसी एजेंडा को फैलाने या एक निजी शोध के बखाने वाले रहे। मैनेडमेंट के जमीनी सिद्धांतों को या तो किसी कंपनी की सफलता के बाद या किसी नई कंपनी में किसी फार्मूले को अपनाने के बाद कारगर माना जाता है। तो ऐसे में किसी नए उद्यमी के लिए इनके बल पर निवेश की कोशिश हमेशा से कमजोर दांव मानी गई।
लेकिन मैनेजमैंट के खिलाड़ी इसे तोड़ तोड़ कर हर अंग को पेश करने लगे। अंग। यानि स्ट्रक्टर, इंफ्रास्ट्रक्टर, ह्यूमन रिसोर्स, वर्किंग एनवायरमेंट, पालिसी, और किसी भी कंपनी की रीढ़ यानि कि इम्प्लाई के स्ट्रेंथ को बढ़ाने के फार्मूले। आज जिस चीज पर सबसे ज्यादा फोकस है वो है आपकी क्षमता। इसके लिए ये जरूरी है कि आप जानें कि आप में क्या क्या गुण है, आप की अच्छाईयां और बुराईयां क्या है। और क्या आप अपनी क्षमता का पूरा उपयोग कर पा रहे हैं। इसके लिए बीते सालों में कई किताबें छपी। लेकिन जिस सीरीज को द इकानामिस्ट ने भी सबसे बेहतरीन माना है, वो है गैलप के साथ स्ट्रेंथ फाइंडर की। इस सीरिज के तहत बाजार में छह किताबें उतर चुकी है। और अगर गौर करें तो इनमें सबसे ज्यादा प्रभावी रही नाऊ डिस्कवर योर स्ट्रेंथ। मार्कस बकिंघम की इस किताब में वो सब लिखा है, जिसका आपको निजी और व्यवसायिक जीवन में काम पड़ता है।
लेकिन क्या पढ़ कर और कभी कभी उसे अपनाकर आप सफल हो सकते है। ये इसपर भी निर्भर करता है कि सफलता आपके लिए क्या मायने रखती है। कभी कभी पद या पैसा वो सब नहीं देता, जो मन का काम करना देता है। ज्यादा जरूरी है कि आप ये जाने कि आप कैसे वयक्ति है। इसके लिए तमामा शोध हुए। जिस एक शोध को आप अपना सकते है, वो किया है यूनिवर्सिटी ऑफ पेंसिल्वेनिया ने। आथेंटिक हैपिनस सिरीज के तहत इसे नाम दिया गया वाया सिग्नेचर स्ट्रेंथ क्वेश्चनेयर। आप यहां पर जाकर, अपने आप को एनराल कराकर पा सकते है वो चौबीस गुण, जो 240 सवाल के मल्टिपल जबाव के बाद आता है। ये मानक तो हो ही सकता है। दरअसल कई सालों के बाद की रिसर्च के बाद ये सवाल आपको ये बता पाने में सफल होते है कि आपके पांच प्रभावी गुण क्या है और इक्कीस अन्य गुण।
खैर। खुद को मानसिक और व्यावहारिक तौर पर संवारने की इस कवायद में हम आप न भी लगे हो, तो भी खुश रह सकते है। क्योंकि किसी न किसी तौर पर हम आप करते वहीं है, जो हमें थोड़ा बहुत संतुष्टि देता है।
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भव्य foryou2005@gmail.com
"चजइ"
Friday, January 11, 2008
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1 comments:
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