बहुत दिनों से ब्लागों की दुनिया से दूरी रही। पता नहीं क्यो। मन नहीं करता था कि किसी एग्रीगेटर पर जाकर तलाशूं कि क्या पढ़ू, क्या छोड़ू। ये अजीब सा समय है। सुबह अखबार की खबरों से लेकर टीवी समाचार तक पसरी सूचनाओं की भीड़ में खुद को तलाशना कठिन है। अखबारों के पन्ने ज्यादा होते है। वजन ही पचास से सौ ग्राम होता है। अपितु हिंदी अखबारों के पन्ने हल्के होने लगे है। टीवी पर दौ सौ चैनलों में समरूपता हावी है। खबरें, फिल्में, सीरीयल्स सब एक ही पन्नी में लपेटे लगते है। ब्लाग पर लेखन से एक विविधता के दर्शन होते थे। लेकिन क्लिकर्स की भीड़ खींचने के लिए यहां भी लेख, कविता, विश्लेषण के नामों को लेकर एक्सक्सूजिविटी दिखने लगी है। ये बीमारी है। हर कोई भीड़ खींचने के लिए अनोखे, विडंबना भरे शीर्षकों को चेप रहा है। ये कट कापी पेस्ट जैसा लगता है।
ब्लाग की ताकत भाषा है। यानि कि वो आधार जिसके बल पर उसे रचा जा रहा है। हिंदी एक व्यावसायिक भाषा नहीं है। इसका अंदाजा साहित्यधर्मियों से लेकर आईटी प्रबंधकों को बेहतर है। आज ही पढ़ा कि देश में पांच करोड़ इंटरनेट उपभोक्ता है। इनमें से चार करोड़ शहर में, नब्बे लाख गांवों में। इसी सर्वेक्षण में था कि अंग्रेजी के इस्तेमाल में इसमें 23 से 49 फीसदी लोग जुटे है। यानि कि इंटरनेट की भाषा है अंग्रेजी।
अंग्रेजी भाषा में जो ब्लाग अति लोकप्रिय रहे, वो किसी न किसी माहौल के कारण जाने जाते रहे। चाहे चीन की एक अभिनेत्री का ब्लाग हो या अफ्गानिस्तान के एक भुक्तभोगी का ब्लाग। इनमें रहस्य और प्रस्तुति के पूरे साजोसामान थे। और था मानव उत्सुकता का इंतजाम। ये बात अभी तक हिंदी ब्लागरों में नजर नहीं आती। वो किसी प्रकार से विश्व को कुछ अनोखा नहीं बता रहे है। मैं रामचरितमानस, और अपने प्राचीन वांग्मय के लिए हिंदी ब्लागरों को साधुवाद देता हूं। लेकिन क्या तकनीकी के इस्तेमाल से उन्हे आडियो प्रस्तुति के लिए तैयार करने की जरूरत पर जल्द से जल्द विचार नहीं होना चाहिए। जिससे वो पढ़ने की जहमत के बचने वालों के लिए भी लुभावने हो।
आज भी हम इंटरनेट को नया अनोखा, तात्कालिक शोध, खोज और व्यक्तिगत सूचना के लिए ही ज्यादा से ज्यादा इस्तेमाल करते है। ऐसे समय में जब समय देने के लिए एक मूल्य चुकाना पड़े, तो किसी का सामान्य लिखा पढ़ना समय और पैसे दोनों की फिजूलखर्ची सरीखा होगा। ये ध्यान रखें कि मध्यमवर्गीय शहरों में साइबर कैफे पर वक्त बिताने वाला युवक चाहता है अनोखा और मनोरंजक।
एक ट्रेंड का पीछा करके बीते वक्त में कई अनुत्पादक ब्लगों की एक झड़ी सी देखने को मिलती है। मीडिया की कलई खोलते, अपनी मन की पुकार वाली कविताएं, कई समस्याओं पर बहुकेन्द्रित ब्लाग, अनावश्यक सूचनाओं वाले ब्लाग, ऐसे तमाम प्रयासों की सचाई है कि वे आज भी तलाश रहे है पाठक। पाठक की रूचि को भांपना शायद सबसे बड़ी चुनौती है। सभी माध्यमों के लिए।
जारी रहूंगा....
'भव्य'
Tuesday, May 20, 2008
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4 comments:
सबसे पहले वेलकम बैक।
आपकी बात सौ फीसदी सही है। भीड़ खींचने के लिए ब्लॉग्स पर निरर्थक शीर्षक और विषय चुने जा रहे हैं।
और कहाँ रहे? कोई अता पता नहीं!!!
दोस्त। यहां रहा वहां रहा। पता नहीं कहां कहां रहा। जब रूका तो पता चला कि जहां से चला, वहीं रहा। कैसे हैं आप। दिल्ली की जाम वाली सड़कों पर कब आ रहे है। कबसे आप एक संस्था से निकलकर दूसरी में व्यावहारिक तौर पर स्थापित हो रहे हैं।
Aapki chinta sahi hei, per yehin kucch blogger http://podbharti.com bhhi rach rahe hein, http://nirantar.org bhi aur http://bunokahani.blogspot.com. Vividhta hei, dekhiye apne aas paas :)
आपकी जानकारी सराहनीय है। लेकिन इनका दायरा सीमित लगता है। इन्हे अपना विजन बढ़ाना होगा।
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