कहां से शुरू करूं। परमात्मा से या आत्मा से। शरीर से या सोच से। ‘भगवान’ शब्द को हिंदी में अब पांचों पंचभूत तत्वों में बांटा जा चुका है। भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अंतरिक्ष और न से नीर। वैसे अंग्रेजी के गॉड को जेनेरेटर, ऑपरेटर और डिस्ट्रायर नाम में पहचाना जाता है। अब आप किस परम शक्ति पर विश्वास करते हैं, ये तो आप भी तय नहीं कर सकते है। पैदा भए हिंदू, तो कइसे कहे अल्लाह - के चोले में बंधे जो हैं। खैर, धर्म की बात करते हैं...जिससे दुनिया चल रही है। गलत कहा क्या। वैज्ञानिकों और नास्तिकों को इससे आपत्ति होगी। पर क्या करें, और कोई शब्द है क्या इस माया और मोह के लिए। धर्म अफीम है, धर्म बंधन है, धर्म सत्य का रास्ता है, धर्म ही जीवन है। ये धर्म के समर्थकों और धर्म को ज्यादा समझने वालों की बातें है। पता नहीं कौन ज्यादा सत्य है। पर एक चीज आपको माननी पड़ेगी, जो चीजें किताबों में लिख दी जाती हैं, वो किसी न किसी के लिए सत्य जरूर होती है। मेरे लिए गीता सत्य, तेरे लिए बाइबिल। हम भी लिखते हैं, अपनी बातें, किसी को सत्य समझाने के लिए। भगवान को पता नहीं मंदिर की जरूरत थी या नहीं, पर हमें छत चाहिए थी, सो भगवान को भी दे दिया मंदिर, चर्च और मस्जिद। हमें पूजा पाठ के लिए भगवान की जरूरत है, या वो हमें अपनी आराधना के लिए प्रेरित करता है। पता नहीं अंडा पहले या मुर्गी। हमारी समझ के पहले भी क्या भगवान रहा होगा। खोजना होगा। पर खोजा तो, लिखा हुआ ही जा सकता है। तो कैसे खोजे। गुफाओं में जो कलाकृतियां है, वे आज इतिहास हैं। भगवान का इतिहास।
अब आज का धर्म समझते हैं। भिखारी को एक-दो रूपया, मंदिर में हाथ जोड़कर मन को लगाने की कोशिश, घर में हर दिन की पूजा पाठ के माध्यम से मन की शांति तलाशना, और ग्रहों, जन्मकुंडलियों के चक्र से उन्नति, अवनति समझना। कुछ सिमट सा गया है क्या धर्म। या कहें कि हमारा ज्ञान। बहुत जानना नहीं चाहते हम। सबकुछ तो एक स्वाइप और क्लिक पर मिल जाता है। तो क्यों दिमाग की दही करें। तो धर्म को प्रसारित करने वाले इसी सीमित दायरे में मौजूद असुरक्षा, खतरे और कम एफर्ट में तुरंत मिल जाने की चाह को बाबा, मंदिर और ज्योतिषियों के माध्यम से सीधे एक फोन काल पर दे रहे हैं। पैसे प्रश्न नहीं रह गया है। क्या लेकर आए थे, जो लेकर जाओगे। यही दे जाओं सब।
वैसे धर्म क्यों गढ़ा गया होगा। इंसान को नौतिकता सिखाने के लिए। अपने से साक्षात्कार कराने के लिए। लोगों को रंग के हिसाब से पहचानने के लिए। प्राकृतिक शक्तियों को समझने के लिए। या अपने वंशजों को अपने हिसाब से चलाने के लिए। पर इन सबमें वो परमात्मा नहीं नजर आता, जिसे आप खुद का हिस्सा मानते हैं। मानते हैं, आप पर निर्भर करता है। हिंदू धर्म को यत पिंडे, तत ब्रह्माण्ड – कहता आया है। मुस्लिमों को किसी भी तस्वीर या मूर्ति की आराधना इसी परम शक्ति में विश्वास के लिए ही शायद बताया गया हो, ईसाइयों तो को सुप्रीम पावर में हमेशा से यकीन रहा है। बाकी धर्मों में भी ऐसा ही है।
अब जरा ये बताइए कि विज्ञान इन सब बातों को क्यों नहीं नकारता। वो अपनी बात को रखता है, सैद्धांतिक और व्यावहारिक आधारों पर। पर बनाम में नहीं पड़ता है। भगवान हो तो ठीक, न हो तो ठीक, स्वर्ग हो तो बढ़िया, नर्क न हो तो बढ़िया। लेकिन कोशिका, न्यूट्रान-प्रोटान, बिंगबैंग, सोलर सिस्टम की बात को व्यावहारिक ढ़ंग से रखकर वो आंखे खोलता रहता है। हमारे अपने ज्ञान की। आप सब सच ही मान लेंगे, तो आगे सोचेंगे कैसे। आप सब समझ ही लेगें, तो करेंगे क्या। इसलिए भ्रम और नए शाश्वत सवालों को गढ़ा दिया गया है। मैं कौन हूं, क्यों हूं आदि। अब यदि धर्म बनाम विज्ञान की बहस में पड़ेंगे तो तर्क और कुतर्क की कई मिसाले मिलने लगेंगी। भारत में टीवी आज इस बहस को फैला रहा है। उसे लगता है 2012 में दुनिया खत्म हो जाएगी। सो लड़ाओ। वैसे एक बात जो मुझे धर्म के विषय में समझ आती है, और विज्ञान से जिसका नाता नहीं है वो है नैतिकता। समाज मे नैतिक चीजों को बताने और उसे सही तरीके से स्थापित करने में धर्म की भूमिका होती है। अब अगर पूछा जाए कि विज्ञान कैन सा नैतिक संदेश देता है। तो जवाब मुश्किल होगा। तो क्या विज्ञान विषय भर है, और धर्म विषय का आधार। आप तय करिए।
5 comments:
वाह!! गुरु छा गये,
तथ्य के निकट तक पहुंचा ही दिया।
भव्य अनुशीलन
विचारणीय...विचार कर रहे हैं.
तो बोलो.... बाबा श्री भव्य महाराज की जय....!
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