'रण' से छिड़ी बहस 'पीपली लाइव' पर सुलग रही है। बीड़ी जलइले....के भाव में टीवी न्यूज को दिखाने वाले हमारे देसी चैनलों के सामने अपनी पत्रकारिता को समझाने की चुनौतियां अब फिल्म दे रहा है। प्रिंट पत्रकारिता यानि अखबार पर बनीं फिल्में कभी हिट नहीं हुई। 'मशाल' से लेकर 'न्यू देहली टाइम्स' तक इसे पत्रकारिता के बुनियादी सांचे-ढ़ाचे में पेश किया गया। टीवी पत्रकारिता ने अब फिल्मों में इस दिखाऊ जगत के रंग-ढ़ंग को पेश करने का मौका दिया है।
जनता क्या देखना चाहती है, ये समय और काल तय करते हैं। फिल्म और टीवी में तो देखना-दिखाना, पसंद-नापसंदगी के मानक दर्शक-बाजार की रूचि पर तय होता हैं। लेकिन पत्रकारिता के द्वंद में फंसे पत्रकारों को अपनी तस्वीर देखना भाता ही है। किसी भी टीवी पत्रकार को 'सच को सच' मानने में ज्यादा दिक्कत नहीं होती। यकीन मानिए, जो दिखता है, उसमें सबकुछ झूठ नहीं होता।
अब पीपली... की बात करते हैं। एक गांव के किसान को जमीन नीलाम होने से बचाने के लिए एक लाख की जरूरत है, फिल्म में सबको पता है। लेकिन कायदे-कानून-सीमा-राजनीति और फायदे-नुकसान के लिए हर कोई बेबसी झलकाता है। मीडिया का एक स्थानीय संवाददाता खबर न मिलने की सूरत में एक दिन नथ्था की आत्महत्या की बात को खबर बना देता है। बात मानवीय थी, सच्चाई के करीब। सो खबर को नजरों में बसाने के लिए कई बड़े पत्रकार चल पड़े गांव की ओर। बीच में एक शब्द बसा है - टीआरपी। वो खबर जिसमें सबकी रूचि हो। पब्लिक इंटरेस्ट का एक अर्थ होता है - जनहित और दूसरा जनरुचि। आज का टीवी जनरूचि पर ज्यादा काम करता है। ये हम भी मानते हैं।
तो फिल्म में सारे सवाल उठते हैं, मजाकिया लहजों में। गालियां भी बोली जाती हैं, पर जनता के इस दर्द को कई नहीं समझता। जनता भी हॉल में हंसती ही है। फिल्म को बनाया भी कुछ इसी टोन में है। फिल्म जब खत्म होती है, तो एक पत्रकार की मौत हो जाती है। वो नथ्था के बनाएं दाक्षागृह में शहीद हो जाता है। एक पत्रकार का काम पूरा होता है। पर फिल्म में वो कई बार जलील होता है। खुद की खबर पर शहर के पत्रकारों के रवैये को देखकर गांव का पत्रकार रोता है। पर वो सही बात कहता है।
पत्रकार होना आसान है। बनें रहना मुश्किल। सच आसान है, कहना मुश्किल। फिल्म सच कहती है। अतिरेक भी करती है। फिल्म है भई। पर इसी के आधार पर टीवी पत्रकारों के जज्बे को खारिज करना जायज नहीं लगता है। बनने दीजिए दो चार फिल्में, आने दीजिए उन्हे शोध करने के लिए कि, टीवी के पत्रकार का एक अदद दिन होता क्या है। मेरी जानकारी में अभी तक बनी टीवी पत्रकारिता पर फिल्मों में टीवी पर दिख रही प्रस्तुति को समझकर ही उसे दिखाया जाता है। लेकिन किसी असली पत्रकार के जीवन को समझने के लिए उसके साथ रहना होता है, उसके माहौल को समझना होता है।
मैं किसी भी बेतुकी खबर को टीवी पर पेश करने वाले कौम से कतई सरोकार नहीं रखता है। पर इस कौम पर तोहमत लगाने से पहले इसकी खबरों में सच्चाई की ताकत से आम आदमी को साहस देने की बात को दिमाग में रखिएगा। हर नवोदित को समझदार बनने में समय लगता है। मार्शल मैकलुहान ने कहा था कि - मीडियम इज द मैसेज - माध्यम ही संदेश है। टीवी का विकास एक जनसूचना देने वाले माध्यम के तौर पर हुआ था, बाद में इसमें मनोरंजन शामिल हुआ। सूचना ने समाचार का रूप लिया। अब सूचना, समाचार औऱ मनोरंजन की खिचड़ी परोसी जा रही है। लेकिन ये दौर भी बदलेगा। और एक दिन यहीं सूचना आपको अधिकार देने वाली कोशिश होगी।
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nice
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