Friday, October 22, 2010

ये सिर्फ सफर नहीं है...







दुर्गा दर्शन - कामाख्या शक्तिपीठ, गुवाहाटी, असम


लिखने के लिए लिखा जाए, तो वो रचना नहीं होती। उसी तरह जब घूमने के लिए यात्रा नहीं की जाती, तो वो सफर नहीं होता। लीजिए। हम तो तैयार भी नहीं थे, तारीख थी 4 अक्टूबर 2010, दिन भर के लिए शूटिंग प्लान तय था। शो भी तय था। एंकर तय थीं, दिल्ली में संवाददाताओं के जरिए दर्शकों को शक्तिपीठ के दर्शन कराने थे। मानो मां दुर्गा को ये मंजूर न था। पूरा दिन हम शूट करते रहे। शाम हो रही थी। अचानक फोन आया, और इसके बाद जो हुआ, वो अचानक, आकस्मिक और उल्लसित करने वाला था। हमें आदेश हुआ था कि हम नौ शहरों में मौजूद शक्तिपीठों पर जाकर शूट करना था।

चलिए। दिल्ली से सुबह 8.50 की फ्लाइट। पहला पड़ाव था गुवाहाटी, कामाख्या शक्तिपीठ।

इस शक्तिपीठ के बारे में काफी कुछ सुना था। तंत्र साधना का महापीठ माना जाता है इसे। हम यहां शाम को 6 बजे के करीब पहुंचे। रोशनी में नहाया वो पौराणिक मंदिर एक नजर में तो केवल स्थापत्य के हिसाब से मंदिर ने पहली नजर में काफी प्रभावित किया। मंदिर के हर खंभे पर देवियों के प्रतिमाएं काफी मोहक थी। और सबसे खास था कि मुख्य मंदिर के इस ढांचे में हर कहीं सफेद कबूतरों का जमावड़ा लगा रहता है। इसे देखना काफी अच्छा लगता है। नीलांचल पहाड़ियों पर मौजूद इस मंदिर में तीन देवियां स्थापित हैं। मां सती की योनि यहां गिरने की मान्यता है। इसके अलावा दो और देवियों की शिला भी मुख्य मंदिर के गर्भगृह में मौजूद है। गर्भगृह में दर्शन में तो निराशा ज्यादा होती है, यहां दर्शन की एक कतार सुबह 5 बजे से लगी रही, 501 रूपए देने पर पंडा समाज के लोग यहां खास दर्शन करा देते हैं। ये अच्छा नहीं लगा। खैर हम भी सिफारिशी आधार पर विशेश दर्शन के अधिकारी बनें। घुप्प अंधेरे में रेंगते, कई देहों से सटते हम गर्भगृह में मां कामाख्या की उस शिला पर रखे कई किलो फूलों को छूकर हमने मां को महसूस करने की कोशिश की। इस शक्तिपीठ में कोई मूर्ति या मुखौटा नहीं है। यहां एक शिला है, जिसे अगल बगल से पानी बहता है, पानी को लेकर कई मान्यताएं है, लेकिन भौगोलिक आधार पर ये ब्रह्मपुत्र नदी का ही हो सकता है। साल में जून के महीने में मान्यता है कि मंदिर का ये जल सादा जल लाल हो जाता है, और इसे मां सती के रजस्वला होने का पर्व माना जाता है। इन पांच दिनों में मंदिर में कई सौ मीटर धोती रखकर द्वार बंद कर दिए जाते हैं। और पांच दिन बाद ये पावन कपड़ा यहां के पंडा समाज में बांट दिया जाता है, जो इसे भक्तों को निशुल्क या सशुल्क देता है। मुझे भी दो टुकड़े मिले, काफी मशक्कत के बाद (लेकिन मां की मर्जी कुछ र थी....ये किस्सा इलाहाबाद से जुड़ा, आगे बताउंगा)।

कामाख्या धाम की पहली शाम काफी काफी मोहक थी, तंत्र और धारणाओं के अहसास से दूर। हम उस शाम की रोशनी में जितना काम कर सकते थे, किया। फिर आरती के क्षणों और नगाड़ों के स्वर के बीच मदहोश होने के पलों के साक्षी बनें। ये किसी भी मंदिर या धाम का वो संगीत है, जो मन से जुड़ता है।

भोर की पहली किरण के साथ हम कामाख्या में थे। वक्त कम था, पर जितनी तेजी से हम काम कर रहे थे, दिन उतनी ही थीमी गति से बढ़ रहा था। बलि की प्रथा, देखी है, कामाख्या में भैंस और बकरी की बलि किसी भी एनिमल एक्टिविस्ट को हिला कर रख दे। पर प्रथा है भइया। जारी है।

गुवाहाटी शहर की सड़कें निराश करती है, जाम बहुत लगता है। इस शहर में महसूस करने को और भी कई जगहें होंगी, हम ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे पर एक नाव पर भी जाने का मौका लगा। इतनी चौड़ी नदी नहीं देखी थी, नदी के सीने पर बीचों बीच नीलांचल पर्वत अच्छा लगता है।


इस सफर का अगला पड़ाव कोलकाता है, जहां हमें मिलना था 'रामकृष्ण परमहंस' से....


भव्य'नामा'

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