कालीघाट और दक्षिणेश्वर, कोलकाता
मन को शांत कर लीजिए। गंगा और हुबली की धारा की निर्मलता को महसूस करने के लिए हम कोलकाता में थे। शहर-ए-कोलकाता, घिचपिच यातायात, तंग सड़कों और रेंगने वाली पीली, पुरानी गाड़ियों के बीच एक अलग सी संस्कृति लेकर अपनी ओर बुलाता है। मौका और दस्तूर दोनों हमारे हक में थे। बंगाली समाज का सबसे बड़ा त्योहार दुर्गापूजा के पहले दिन हम बारिश की हल्की फुहार के बीच इस महानगरी में थे। मंजिल भले ही दो मंदिर थे, पर सफर में कई और भी हसरतें थीं। मसलन, रोसोगुल्ला और संदेश का स्वाद लेने की, बारिश में किसी पुल के नीचे चाय और बिस्कुट खाने की।
खैर, 6 अक्टूबर की शाम कोलकाता के नाम थी। होटल में सामान पटका, कुछ आफिस के काम किए, और चाय की चुस्की ली। मजा आया। रात में खाना भी खाया, किसी के घर का, अच्छा लगा, खाना भी साथ भी। सुबह इंतजार में थी....देर रात सोना और जल्दी जगना था।
सुबह 6 बजे हम कालीघाट पर मां काली की शक्तिपीठ के सामने थे। बारिश ने हमें भिंगोने का पूरा इंतजाम किया था। हम भी इस नर्म होते मौसम में काम की ऊर्जा के साथ डटे रहे। मां काली के इस शक्तिपीठ में दर्शन को हर साल लाखों लोग आते हैं, वे मां के बड़े-बड़े नेत्रों और उनकी सोने की जीभ की आभा को नजरों में बसाने को कतारों में लगे रहते हैं। मां के रक्षक पुजारी, किसी को मूर्ति को छूने नहीं देते, लेकिन कुछ खास लोग मां के पैरों के नीचे दबे शिवजी को जरूर स्पर्श कर लेते हैं। मां काली की इस शक्तिपीठ में उनके दाएं पैर की ऊंगली गिरने की मान्यता है।
बारिश ने सूरज की आहट के साथ-साथ अपना असर कम कर दिया। कालीपीठ के दाएं ओर एक कालीकुंड है, जो आस्था के साथ-साथ स्नान का एकमात्र स्थान है। पानी साफ तो नहीं, पर एक डुबकी के बाद क्या साफ, क्या मैला। यहां से मंदिर के गुंबद साफ दिखते हैं। कहा जाता है कि मां के पैर की ऊंगलियां यहीं गिरी थी, जिसे बाद में मंदिर में स्थापित करवाया गया।
मां काली के इस शक्तिपीठ में प्रवेश चार द्वार हैं, मंदिर के चारों ओर पतली संकरी गलियां है, जिनमें प्रसाद की दुकानें है, इनसे एक तरह की आवाजें आपको बुलाती है। मंदिर के अंदर बलि का भी स्थान है। कालीघाट जब जाएं, तो कोशिश करें कि किसी परिचय से ही जाए, दर्शन तो सुलभ हो जाएगा। और हां प्रसाद में लालफूल जरूर चढ़ाएं। मंदिर में दोपहर में भंडारा भी होता है, अच्छा प्रसाद मिलता है।
मंदिर के पास ही गंगा नदी बहती हैं, यहां कभी किसी तपस्वी ने मां की घोर आराधना की थी। गंगा वैसे को कहीं साफ नहीं रह गई है, यहां आप इसे देखेंगे तो मन दुखी ही होगा। गंगा से एक ओर से दूसरी ओर जाने के लिए केवल 50 पैसे लगते हैं। आज भी।
मंदिर के पास ही गंगा नदी बहती हैं, यहां कभी किसी तपस्वी ने मां की घोर आराधना की थी। गंगा वैसे को कहीं साफ नहीं रह गई है, यहां आप इसे देखेंगे तो मन दुखी ही होगा। गंगा से एक ओर से दूसरी ओर जाने के लिए केवल 50 पैसे लगते हैं। आज भी।
मां काली के इस घाट पर शूटिंग में आधा दिन निकल गया। अब हमें वहां जाना था, जहां की शांति ने इस शहर के कोलाहल को भुला दिया। जहां रामकृष्ण परमहंस ने एक मिथक रचा था।
दक्षिणेश्वर। गंगा के तट पर बसा एक विशाल मंदिर। तीन मंजिला, गर्भगृह में मां काली। प्रांगण में द्वादश शिव मंदिर और कृष्ण संग राधा। मानो पूरे संसार का ज्ञान और ध्यान यहां बसा है। शांत, निर्मल, पावन और अद्भुत स्थापत्य। मंदिर को आपने कई रंगों में देखा होगा। लेकिन पीली और गहरे भूरे रंग की चकत्तों वाला निर्माण देखते ही बनता है। बड़ा सुकून मिलता है यहां, तभी तो विवेकानंद को कई आगमन में यहां से वो मिला, जिसे हम आज भी जानना चाहते हैं।
इस मंदिर को एक विधवा रानी रासमणि ने बनवाया था। कथा सच ज्यादा है, मान्यता कम। रानी बनारस जा रही थी, पूजा पाठ को, तभी एक सपने ने उन्हें रोका, और इस सपने के बाद यहां मंदिर का निर्माण शुरू हो गया। आज भी राजपरिवार के लोग यहां काम धाम देखते हैं। अब मिलते हैं हमारी संस्कृति के एक अमिट नाम से। रामकृष्ण परमहंस। एक साधक, ज्ञानी, भक्त और सर्वगुरू से।
रानी ने जब दक्षिणेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया तो उन्होने यहां मां काली की एक मूर्ति लगवाई, जो बाद में उन्हे पसंद नहीं आई। तब मंदिर के पुजारी के सुझाव पर यहां मां काली की एक नई मूर्ति लगवाई गई, जो आजतक स्थापित है, ये पुजारी रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई थे।
रानी ने जब दक्षिणेश्वर मंदिर का निर्माण करवाया तो उन्होने यहां मां काली की एक मूर्ति लगवाई, जो बाद में उन्हे पसंद नहीं आई। तब मंदिर के पुजारी के सुझाव पर यहां मां काली की एक नई मूर्ति लगवाई गई, जो आजतक स्थापित है, ये पुजारी रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई थे।
रामकृष्ण परमहंस, जिनका असली नाम गजोधर चट्टोपाध्याय थे, बचपन से धार्मिक प्रवृत्ति के थे, को इस मंदिर में अपने बड़ा भाई की आकस्मिक मृत्यु के बाद यहां का पुजारी नियुक्त किया गया। पहले वे राधा-कृष्ण मंदिर के पुजारी थे। लेकिन एक बाद जब उन्हे मां काली के मंदिर में पुजारी नियक्त किया गया तो कई ऐसी घटनाएं हुई, जो अब किवदंतियां और विश्वास दोनों है।
एक बार विवेकानंद परेशान होकर इसी मंदिर में चले आए, मंदिर में पुजारी थे रामकृष्ण परमहंस। पुजारी ने नरेंद्र से कहा कि जाओं मां से जो मांगना है, मांग लो। नरेंद्र तीन बार अंदर गए, और बिना मांगे वापस चले आए। तब रामकृष्ण परमहंस को इस बालक की प्रतिभा का पता चला। आगे जो हुआ, वो सबको पता है।
दक्षिणेश्वर मंदिर में वैसे तो देखने को 14 चीजें है, मतलब मंदिर। लेकिन मंदिर के सामने के दलान में सुबह-शाम होने वाली आरती-कीर्तन और सत्संग में शामिल होना अद्भुत होता है। मानो किसी धारा के साथ आप न चाहते हुए भी बहते जाते हैं। और एक ज्ञान की प्राप्ति का अहसास पाते हैं। हर कही रामकृष्ण परमहंस और विवेकानंद समाए लगते हैं। मंदिर में वो पेड़ भी है, जिसके नीचे रामकृष्ण ने बहुत समय बिताया। और वो किनारा भी है, जहां से कल-कल बहती गंगा सीढ़ियों से लिपटते बहती है। बस कुछ क्षणों के लिए यहां बैठिए, और मन की हलचल को ठहरते देखिए।
आगे हम वहां पहुंचे.......जहां कामदेव और रति के ऊपर खून की धार छोड़ती बसी हैं देवी।
भव्य ‘नामा’
भव्य ‘नामा’
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