Saturday, December 25, 2010

एक रिश्ते की खोज...

लोग जाते क्यों है। ये जाना केवल जिंदगी में रिश्तों का ही नहीं होता। साथ में एक दो पल अपनेपन का अहसास देने वाले भी जब जाते हैं, तो अखरता है। शाम को जब सूरज डूबने को होता है, अंधेरा आने को होता है, तब कहीं भी किसी खुले मैदान या पार्क में खेलने वाले बच्चे इस जाते वक्त को रोक लेना चाहते हैं, वे अपने दोस्तों से अलग नहीं होना चाहते। स्कूल में आधे घंटे के इंटरवल को दिन के सबसे बेशकीमती पल बना लेने में हम कई बार सफल रहे हैं। खाली क्लास में कुछेक दोस्तों के साथ कई घंटे कब गुजरे पता ही नहीं चला। और जब प्रेम किया तो वक्त प्रेमिका की अनकही बातों में सालों की तरह बीत गया। यानि जिससे जितना जुड़ो, उतना ही वो आपके समय को तेज कर देता है। जीवन में मायने तलाशने के लिए हम ‘काम’ करते है, मतलब नौकरी। इसी के जरिए कुछ पहचान पाने की लालसा, और जिम्मेदारियां निभाने की कोशिश में हम एक ही काम को हर दिन करके संतुष्टि का भाव पालते हैं। साल दर साल ये काम बढ़ता-बदलता-चलायमान ही है, हमारी पहचान से ज्यादा। लेकिन लोगों से जुड़ने की इस प्रक्रिया में आप कुछ लोगों से ज्यादा जुड़ते है और कुछ से न के बराबर। अब जरा अपने ‘वास्तविक सोच’ को आइना बनाकर किसी से न जुड़ने की वजह जब आप तलाशेंगे, तो पाएंगे कि ये केवल आपके निजी विचारों और उसके विचारों के बीच रिश्ता न बना पाने की वजह से है। काम तो आप एक जैसा करते हैं, काम के प्रति विचार भी एक जैसे रखते हैं, काम में प्रतिस्पर्धा भी समान है, काम का माहौल भी एकसा है। और हर दिन के उतार-चढ़ाव भी एक समान। पर दो लोगों के बीच सारी समझ केवल खुद के विचार से ही बनते हैं। काम से नहीं।

हम लोगों को समझना नहीं चाहते। या कहें कि लोग हमें नहीं। दोनों एक ही बात है। रिश्ते बनाना दुरूह काम है। क्योंकि एक बार ये बन गए, तो इससे जुड़ी तमाम बातें इसे बरकरार रखने के लिए जरूरी हो जाती हैं। कुछ भी समझने की सबसे दिक्कत है कि इससे ही आगे निभाने या टालने का पहला प्रश्न खड़ा हो जाता है। सो हम समझदारी में टालने को वक्त के साथ ज्यादा महत्व देते जाते हैं। वैसे हम सहज संबंधों में ज्यादा आसानी पाते हैं। सो दोस्ती ही एकमात्र रिश्ता हैं, जहां दो व्यक्तित्व एक जगह-विचार-विस्तार में बिना किसी हस्तक्षेप के साथ रह सकते हैं। तो क्या सबको दोस्त बना लें। नहीं। पर हां सबसे दोस्ताना तो हुआ जा सकता है। मसलन, बीवी से उसकी सोच के अनुरूप ही व्यवहार करना व्यवहारिकता और आपकी ‘दोस्ताना समझदारी’ की मिसाल बन सकता है। और सहकर्मी के साथ बातें खुलकर कहने में मददगार।

जाहिर है वक्त के साथ संबंधों में जो ऊर्जा घटती है, उसे केवल आपका खुलापन ही दूर कर सकता है। स्वीकारना ही सबसे बड़ी सच्चाई है। और इससे ही नई राहें खुलती है। हम ज्यादातर अपनी सामाजिक स्वीकार्यता और पहचान को मानक बनाकर भविष्य के प्रति नींद में रहते हैं। लगता है सपनें नींद में ही अच्छे। हमारी पहचान के भी स्तरों पर हम गौर करना होगा। कुछ लोग बहुत अच्छी बात करते हैं, पर उनका जीवन सबके लिए उदाहरण नहीं होता। कुछ लोग काम में बेहतरीन होते हैं, पर वे सबके प्रिय नहीं होते। ऐसे तमाम विरोधाभास आपको अपने पास मिलते रहते हैं। पर इसके लिए कारण खुद को ‘कुछ और बनाकर’ पेश करने से पैदा होती है। जबकि आपकी सच्चाई उस स्वीकार्य सच से अलग होती है, जो परिस्थितिवश निर्मित है। असली व्यवहार वो है जिसे आप बिना किसी सोच के करते हैं।

हमारे जीवन में कई बार अच्छा या बुरा लगने का फैसला या उसे जाहिर करने का फैसला हम अगल-बगल देखकर करते हैं और एक समय के बाद ये हमारे व्यवहार का हिस्सा बन जाता है। कई बार जब हम, हम होते हैं, तो इस बनावटी या ‘खुद को खो देने’ वाला व्यवहार हमें हमारा नहीं लगता। पर इसे तोड़ना हमें नहीं आता। दरअसल ये फैसला हमारे खुद के सही और गलत से जुड़ा होता है। हम ‘अपनी बनाई दुनिया’ को ही सबकी दुनिया मानते हैं। सामाजिक ताने-बाने के इस आवरण में खुद को सबसे अलग बनाए रखने के लिए हम सबके जैसे हो जाते हैं और पारस्परिक व्यवहार या प्रशंसा को खुद की पहचान का मानक मानना हमारी मजबूरी बन जाता है।

अपने काम के अनुभव और वास्तविक जीवन के अनुभव को आप एक पलड़े में रखकर देखने का आदी नहीं होते हैं। आपको हमेशा ये समझाया गया है कि पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ अलग-अलग रखनी चाहिए। सो आप मानते है कि आप अर्द्धनारीश्वर जैसी कोई रचना है, और कहीं कुछ और कहीं कुछ और बने रहने में ही आप सफलता के करीब हैं। खैर बदलने के लिए, या सही को सही महसूस करने के लिए निरपेक्ष होना पड़ता है।

लोगों का जाना आपको इसलिए अखरता है कि क्योंकि वे या तो आपके जीवन में आपको आपका महत्व समझाने वाले होते हैं, काम में आपके लिए दोस्त, मानक स्थापित करने वाले, या बिना लाग-लपेट खुद बने रहने वाले होते है। जीवन के और रिश्तों में निभाना और बनाए रखना कई बार सामाजिक नैतिकता-अनैतिकता के दायरे में ज्यादा आता है। पर काम और दोस्ती में ये आपके खुद की दुनिया में दूसरे की बिना छेड़छाड़ किए मौजूद रहने की कला जैसा होता है।

हम आगे ही जा सकते है, पीछे नहीं। पीछे के रिश्ते, दोस्ती, संबंध दोबारा साथ आने पर भी अहसास का वो गुलदस्ता नहीं खिला सकते, जो बीते मौसम में घटा था। इसलिए किसी भी रिश्ते को वक्ती अहसास मानकर खारिज करना, खुद से दगा करने जैसा है। आप जो भी महसूस करते है, वो आपके बिताए पूरे जीवन का निचोड़ होता है। मिलना-मिलाना, निभना-निभाना, करना-करवाना जैसे शब्दों के मायने केवल आपकी सोच से बदलते हैं। सो इस बार जब कोई जाता दिखे, तो उसे रोककर खुद बनकर’ थोड़ा अपने साथ जोड़ लीजिएगा। ये ही संसार का सबसे बड़ा रिश्ता होगा।


भव्य

1 comments:

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